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रोखठोक: पुतिन आएंगे,… पुतिन जाएंगे!

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक

रूस ने यूक्रेन को करीब-करीब नष्ट कर दिया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की हाथ में बंदूक लेकर सड़क पर उतरे लेकिन ‘नाटो’ ने उनकी मदद के लिए सेना नहीं भेजी। क्योंकि बलशाली रूस के सामने किसी की दाल नहीं गलेगी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़बोले लोगों की संख्या बढ़ रही है। यूक्रेन प्रकरण में यह देखने को मिला। पुतिन आएंगे, पुतिन जाएंगे परंतु उनके आक्रमण से एक देश, इंसान और दुनिया की शांति नष्ट हो गई।

रूस और यूक्रेन के बीच घनघोर युद्ध हो रहा है। इस वजह से पूरी दुनिया युद्धग्रस्त हो गई है। यूक्रेन पर रूस जिस तरह से बमबारी कर रहा है, उसकी तस्वीरें विदारक हैं। यूक्रेन की जीवित राजधानी, कीव का रूपांतर करीब-करीब कब्रिस्तान, श्मशान जैसा ही हो गया है। मानवीय जीवन का मोल नहीं रहा तो वहां संपत्ति का क्या मोल रहेगा? बलशाली रूस के खिलाफ यूक्रेन अकेले लड़ रहा है। यूक्रेन को सहानुभूति सभी की मिल रही है लेकिन सिर्फ शाब्दिक। जो बाइडेन अमेरिकी फौज यूक्रेन में भेजने को तैयार नहीं हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक प्रमुख सूत्र को समझना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र के कोई चिरस्थायी मित्र नहीं होते हैं। चिरस्थायी होते हैं केवल उनके हित। यूक्रेन-रूस के मामले में यही हुआ है। रूसी मिसाइलों से जब एक देश जल रहा था, तो यूक्रेन के साथ निश्चित तौर पर कौन खड़ा हुआ? यूरोपियन देश, नाटो, यूएनओ जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर केवल रूस के खिलाफ निषेध प्रस्ताव पारित किया गया। इससे यूक्रेन की तबाही बंद हुई क्या?
आजादी का परचम
सोवियत संघ से जो देश अलग हुए और जिन्होंने आजादी का अलग परचम लहराया, उनमें एक देश यूक्रेन है। १२ जून, १९९० को एक प्रस्ताव पास करके अपनी संप्रभुता की घोषणा की। सोवियत संघ से बाहर निकलने का हमें अधिकार है, ऐसी घोषणा करनेवाले १५ प्रांतों में यूक्रेन शामिल था। मास्को की वैचारिक, सरकारी और कम्युनिस्ट पार्टी के वर्चस्व को इन देशों ने नकार दिया था। रूस से यूक्रेन का अलग होना रूस को इतना क्यों चुभा? क्योंकि रूस के १८,००० परमाणु बम और चेर्नोबिल परमाणु रिएक्टर यूक्रेन में था। दूसरा ये कि यूक्रेन रूस का आधिपत्य स्वीकार करने को तैयार नहीं था और उसकी पहले से ही दिलचस्पी यूरोपीय संघ ‘नाटो’ का सदस्य बनने में अधिक थी। यदि यूक्रेन नाटो का सदस्य बन गया तो एक दिन नाटो सैनिक और अमेरिकी टैंक रूस की सीमा पर खड़े होंगे और रूस की संप्रभुता के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो जाएगी। पुतिन २२ साल से रूस पर राज कर रहे हैं। रूस के विघटन के बाद वे सत्ताधीश बने हैं, लेकिन बर्ताव स्टालिन जैसे सत्ताधीश वाला है। मास्को के रेड स्क्वायर में क्रेमलिन की दीवारों के पीछे पुतिन नामक एक सत्ताधीश बैठता है, जो दुनिया पर राज करने का मंसूबा रखता है। उसके लिए वह सीमावर्ती यूक्रेन नामक एक भव्य देश को तहस-नहस करके यूरोप और अमेरिका को चुनौती देता है। जब किसी देश में महंगाई और बेरोजगारी जैसी आंतरिक समस्याएं तूफान मचाने लगती हैं तो उस देश का शासक देशभक्ति, राष्ट्रवाद का भावनात्मक जाल तैयार करता है और दूसरे देशों से खतरा होने के आडंबर रचकर जंग लड़ता है। पुतिन ने यही किया है। हिंदुस्थान में होनेवाला ‘हिंदुस्थान-पाकिस्तान’ का खेल उसी तरह का है। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का समर्थन कोई नहीं करेगा, लेकिन अमेरिका को ९ हजार किलोमीटर दूर स्थित यूक्रेन में इतनी दिलचस्पी क्यों है? रूस की सीमा पर स्थित यूक्रेन के लिए ‘सैन्य गठबंधन’ और ‘नाटो’ में शामिल करने की जरूरत क्या है? रूस-यूक्रेन का युद्ध खत्म हो, ऐसा अमेरिका नहीं चाहता है। इस मामले में रूस को अलग-थलग करना और बदनाम करना, यही अमेरिका का उद्देश्य है!
हिंदुस्थानी छात्र
यूक्रेन में हजारों हिंदुस्थानी छात्र फंसे हुए हैं। उन्हें लाने के लिए सरकार के चार केंद्रीय मंत्रियों को भेजा गया है। दो छात्रों की इस युद्ध में मृत्यु हो गई और सैकड़ों छात्रों को नरक यातना भोगते हुए पदयात्रा करनी पड़ी। ‘हिंदुस्थान के सामर्थ्यवान होने के कारण ही हमारे छात्रों की रूस-यूक्रेन सीमा से रिहाई हो सकी!’ ऐसा भाषण प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश के चुनावी प्रचार में दिया। सच्चाई यह है कि पहले आठ दिन हजारों छात्रों का कोई माई-बाप ही नहीं था। सैकड़ों मील भूखे, चलकर ये बच्चे पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया की सीमा पर असहाय अवस्था में खड़े रहे। उनके आक्रोशित होने पर वहां असंतोष की चिंगारी भड़कने लगी। तब सरकार हरकत में आने को मजबूर हुई। इस दौरान ‘विदेश मंत्रालय’ निश्चित तौर पर क्या कर रहा था? अपने समय में पंडित नेहरू ने विदेश मंत्रालय को एक ‘स्वतंत्र इंस्टीट्यूशन’ की तरह से विकसित किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, इतिहास का भान और हिंदुस्थानी गुटनिरपेक्षता मतलब स्वतंत्र, अलिप्तता की भूमिका की एक महान परंपरा हमारे विदेश मंत्रालय को मिली, लेकिन विदेश मंत्रालय के सिर पर अब काली टोपी और अंध भक्ति का प्रभाव दिखता है। जिन नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की श्री मोदी आलोचना करते रहे, रूस-यूक्रेन विवाद के दौरान ‘यूनो’ में उसी गुटनिरपेक्षता को स्वीकार करना पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी को नेहरू की ही नीति ने बचाया!
नाटो की मीडिया
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को पश्चिमी देशों ने दुनिया का हीरो बना दिया। बंदूक हाथ में लेकर लड़ने और देश छोड़कर नहीं जाऊंगा, ऐसा कहनेवाले जेलेंस्की की तस्वीरें और वीडियो दुनियाभर में प्रसारित की गर्इं। बेशक रूस के हाथ में फौज होगी, परंतु मीडिया नाटो देशों के हाथ में है। रूस की मुद्रा रूबल है। उसकी आज बिल्कुल भी कीमत नहीं रह गई है। पुतिन ने अपने देश को स्टालिन के दौर में पहुंचा दिया है। स्टालिन के समय रूसी लोगों पर बोलती बंद करने का गहरा प्रभाव पड़ा था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होगी तो लोग शराब पीने लगते हैं। रूस में आज यही हो रहा है। रूस-यूक्रेन की जंग पुतिन की खुजली है। चर्चा से मार्ग निकाला जा सकता था लेकिन पुतिन ने सीधे युद्ध का एलान कर दिया। सैकड़ों लोग, सैनिक, छोटे बच्चे मारे गए। तकलीफें सहकर लोगों द्वारा बनाए गए घर, संस्थान, उद्योग नष्ट हो गए। एक पूरा देश ही खत्म हो गया और लोग विस्थापित हो गए, लेकिन वैश्विक मंचों पर हर कोई राजनीतिक भूमिका निभाता नजर आ रहा है। आज आर्मेनियाई सीमा पर सबसे ज्यादा विस्थापितों का हुजूम है। इसमें हिंदुस्थानी छात्र भी हैं। आर्मेनिया रूस से अलग हुआ था, लेकिन ७ दिसंबर, १९८८ को आर्मेनिया में एक बड़ा भूकंप आया था। इस भूकंप में ३५ हजार लोग मारे गए थे, ८ लाख बेघर हो गए। गोर्बाचेव तब यूएनओ में थे। वहां से वे वापस आ गए। इसमें ७५ गांव, १९ छोटे-बड़े शहर तबाह हो गए, लेकिन उस विनाशकारी प्राकृतिक आपदा में इतना हुआ कि पूरी दुनिया आर्मेनिया की मदद के लिए दौड़ पड़ी। बाद में आर्मेनिया, रूस का हिस्सा नहीं रहा। वह दुनिया का हो गया। राजनीतिक दर्शन, धर्म, देश-विदेश की राजनीति, ये सब उस आपदा ने खत्म कर दिया। बचा तो सिर्फ इंसान का इंसान से रिश्ता और इसलिए आर्मेनिया के लोगों ने बाद में दुनिया का आभार माना। वो शब्द बहुत ही अनमोल हैं:-
‘Thank you people of the Earth, we are children of one planet and nature!’
आपदा से उत्पन्न हुए इस चिरस्थायी विचार को शांति के दौर में सभी लोग याद रखें तो इस धरती के सभी मनुष्य सहजतापूर्वक सुख के साथ जी सकेंगे। फिर वह किसी भी रंग, धर्म व देश के हों, वो सुखी हो सकते हैं। खाक से यूक्रेन भी एक दिन फिर से बाहर निकलेगा। पुतिन आएंगे और पुतिन जाएंगे!

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