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संपादकीय: गडकरी का किला!

जिस तरह से महाकाव्यों में राष्ट्र की आकांक्षाएं प्रकट होनी चाहिए उसी तरह नाथ पई की वाक्पटुता में हम सभी के प्रतिसाद प्रतिध्वनित होते हैं, कवि वसंत बापट ने एक बार ऐसा कहा था। हाल के दिनों में नितिन गडकरी के कई बयानों में जनभावना का प्रभाव देखने को मिलता रहा है। नागपुर में गडकरी द्वारा दिया गया भाषण सभी को सोचने को मजबूर करनेवाला है। ‘वर्तमान में, ‘राजनीति’ शब्द के अर्थ को समझने का समय आ गया है। महात्मा गांधी के दौर में, राजनीति राष्ट्रनीति थी, विकासनीति थी। लेकिन अब राजनीति सौ प्रतिशत सत्ता की नीति बन गई है। इसलिए राजनीति कब छोड़ दूं, ऐसा महसूस होने लगा है।’ श्री गडकरी द्वारा परित्याग की ऐसी बातें करना कष्टप्रद है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में गडकरी का दम घुट रहा है। जो हो रहा है वह उनके लिए असहनीय होता जा रहा है, लेकिन करें क्या? यह सवाल मुझे परेशान कर रहा है। एक आदमी कितना जिया, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह वैâसे जिया। कुछ लोग जीवन मूल्यों के लिए आजीवन संघर्ष करते हैं लेकिन वे राजनीति में सफल होते ही हैं, ऐसा नहीं है। नैतिकता और राजनीति ये दोनों अलग बातें होने के कारण नैतिकता का निर्वाचित होने से कोई संबंध नहीं है। आज की राजनीति के इस सत्य पर श्री गडकरी ने जानबूझकर उंगली उठाई है। गडकरी खुद को वर्तमान राजनीति में ‘फिट’ नहीं मानते है। चारों तरफ पहरेदारों का घेरा हैं और हाथ में अनीति की तलवारें टकरा रही है इसलिए व्याकुल गडकरी ने नागपुर में मन का बोझ हल्का किया, ऐसा लगता है। वर्तमान राजनीति विचारों की, नैतिकता की नहीं रही है। श्री गडकरी ने गांधी के दौर की राजनीति का जिक्र किया लेकिन भारतीय जनता पार्टी गांधी के विचारों को नहीं मानती है फिर भी गडकरी ने गांधी का उदाहरण दिया यह महत्वपूर्ण है। पहले समाज नीति के लिए लोग राजनीति में आते थे। आज ऐसा नहीं है। जिन्हें विधायक, सांसद, मंत्री बनना है, इच्छा मुख्यमंत्री या किसी महामंडल का सदस्य बनने की होती है, ऐसे लोग राजनीति में आते हैं। कुछ लोग तो सबकुछ पाने और मिलने के बाद भी स्वजनों से दगा करते हैं। कई लोग यहां से वहां कूदते हैं। मां का दूध बाजार में बेचनेवाली औलादें आज की राजनीति में तैयार हो गई हैं। इस पर गडकरी अफसोस जताते नजर आते हैं। कई साहित्यकार, कलाकार, अच्छे राजनीतिज्ञों का एक जैसा ही धर्म होता है अर्थात ‘Those who fell the joint agony of the world and toil like slaves to cure humanity for mortal good’ ऐसा किट्स ने कहा है। मानवता के संबंध में यह दया, यह वेदना, यह संवेदना, यह सहानुभूति जिनके अंत:करण में कूट-कूटकर भरी होती है वह कभी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में राजनीति में आता है तो कभी देश की गुलामी सर्वसत्तावाद नहीं देख पाता है इसलिए आत्मयज्ञ के लिए तैयार होता है। आज ऐसा आत्मयज्ञ करने की इच्छा रखनेवाले को राजनीतिज्ञ देश के शत्रु ठहराए जाते हैं। आज देश में एक प्रकार से भ्रम का ही माहौल है। ध्येयहीनता है। तमाम श्रद्धास्थल धराशायी हो गए हैं। जनता का तेज भंग हो चुका है। और जनता एक भय के साए में है। आज हिंदुस्थान में कई बातों की अग्निपरीक्षा हो रही है। न्याय, लोकतंत्र, मानवता, संसदीय लोकतंत्र, अखबार, देश की अखंडता, व्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसी कई बातें बचेंगी कि नहीं? कई मूल्य हमारे पास रहेंगे कि नहीं? जो जीवन का दान देकर मिला था वो बचेगा कि नहीं? अत्यंत कसौटी के दौर से यह राष्ट्र, महाराष्ट्र व समाज गुजर रहा है। इंसान खरीदना और इंसानों की बोली लगाना यही राजनीति का धर्म बन गया है। इस माहौल में नितिन गडकरी का बोलना थोड़ा निराशाजनक होगा फिर भी कलाई में चेतना निर्माण करनेवाला भी है। वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में गडकरी सबसे अनुभवी एवं कार्यसक्षम मंत्री हैं। राजनीतिक बदले की भावना से बर्ताव करनेवाले नेता वे नहीं हैं। श्री शरद पवार, श्री बालासाहेब ठाकरे की तरह समाजनीति बचेगी तो ही राजनीति बचेगी। इस भूमिका के प्रति वे दृढ़ हैं। बेहद कम उम्र में वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें। परंतु दूसरी बार अध्यक्ष बनने का मौका आया, उसी दौरान उनके खिलाफ षड्यंत्र रचकर रोक दिया गया। गडकरी की कई संस्थाओं पर तब ‘ईडी’ सहित जांच एजेंसियों के छापे पड़े। उन्हें बदनाम किया गया। गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का दूसरा ‘टर्म’ मिला होता तो देश का राजनीतिक इतिहास पूरी तरह से बदला हुआ नजर आता। गडकरी उसी समय से व्यथित हैं। उनकी व्यथा बीच-बीच में प्रकट होती रही है परंतु इसके लिए मंच नागपुर का ही होता है ये खास बात है। श्री नितिन गडकरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर अनुयायी हैं। इसलिए उनके विचारों की बुनियाद मजबूत है। समाजनीति के लिए गटरवाली राजनीति छोड़ने की प्रेरणा नागपुर से ही मिलती होगी। गडकरी कहते हैं इसलिए पेड़-पत्तों में थोड़ी बहुत तो सरसराहट होती है। अन्यथा लोकतंत्र के तमाम वृक्ष फिलहाल ठूंठ बने नजर आते हैं। गडकरी का किला अभेद रहे यही लोकतंत्र की जरूरत है।

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