मुख्यपृष्ठस्तंभ3रा काॅलम : गणगौर से रमेगा राजस्थान, मुंबई में भी बिखरेगी छंटा

3रा काॅलम : गणगौर से रमेगा राजस्थान, मुंबई में भी बिखरेगी छंटा

 रमेश सर्राफ धमोरा
झुंझुनू, राजस्थान
राजस्थानी परंपरा के लोकोत्सव अपने आप में एक विरासत को संजोए हुए है। गणगौर भी राजस्थान का ऐसा ही एक प्रमुख लोक पर्व है। लगातार १७ दिनों तक चलनेवाला गणगौर का पर्व मूलत: कुंवारी लड़कियों व महिलाओं का त्योहार है। राजस्थान की महिलाएं चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों गणगौर के पर्व को पूरी उत्साह के साथ मनाती हैं। मुंबई और आस-पास के इलाकों में भी गणगौर की छंटा बिखरेगी। विवाहिता व कुंवारी सभी आयु वर्ग की महिलाएं गणगौर की पूजा करती हैं।
गणगौर शब्द भगवान शिव और पार्वती के नाम से बना है। गण यानी भगवान शिव और गौर यानी पार्वती। इसलिए शिव-पार्वती की पूजा के रूप में इस त्योहार को मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन से सोलह दिनों तक लड़कियां प्रतिदिन प्रात: काल ईसर-गणगौर को पूजती हैं। जिस लड़की की शादी हो जाती है वो शादी के प्रथम वर्ष अपने पीहर जाकर गणगौर की पूजा करती है। इसी कारण इसे सुहागपर्व भी कहा जाता है। कहा जाता है कि चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह शंकर भगवान के साथ हुआ था। उसी की याद में यह त्योहार मनाया जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों में आधे दिन का अवकाश रहता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहल से निकलती है। इनको देखने को बड़ी संख्या में देसीr-विदेशी सैनानी उमड़ते हैं।
राजस्थान को देव भूमि कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। यहां सभी संप्रदाय फले-फूले हैं। राजस्थानी शासकों ने विश्व कल्याण की भावना से अभिभूत होकर लोक मान्यताओं का सदा सम्मान किया है। इसी कारण यहां सभी पौराणिक एवं वैदिक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। सभी उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। गणगौर का उत्सव भी ऐसा ही लोकोत्सव है, जिसकी पृष्ठभूमि पौराणिक है। काल प्रभाव से उनमें शास्त्राचार के स्थान पर लोकाचार हावी हो गया है। परंतु भाव-भंगिमा में कोई कमी नहीं आई है। आज आवश्यकता है कि हम इस लोकोत्सव को अच्छे वातावरण में मनाएं। हमारी प्राचीन परंपरा को अक्षुण बनाए रखें। इसका दायित्व उन सभी सांस्कृतिक परंपरा के प्रेमियों पर है, जिनका इससे लगाव है। जो ऐसे पर्वों को सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।)

 

अन्य समाचार