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मोदी सरकार की पोल खोलेगी ४६ पन्नों की शैडो रिपोर्ट! …एफएटीएफ को भेजी गई है

• देश के गुमनाम लोगों ने की है तैयार
• मामला एनजीओ की फंडिंग रोकने का
देश में मोदी सरकार की दिनोंदिन बढ़ती जा रही मनमानी से हर कोई परेशान है। एक तरफ वह सरकारी खजाने का बेजा इस्तेमाल करने से बाज नहीं आती, दूसरी तरफ केंद्रीय जांच एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल यह बताता है कि वह इनसे डरी हुई भी है। २०२४ में हार के डर से वह विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। इसी बीच मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा खेला होने जा रहा है। कुछ गुमनाम लोगों ने एक शैडो रिपोर्ट बनाकर उसे एफएटीएफ को भेज दिया है। ४६ पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह से मोदी सरकार देश में सामाजिक हित में कार्य करनेवाले गैर सरकारी संगठनों को निशाना बनाते हुए उनकी फंडिंग रोक रही है।
दरअसल, हिंदुस्थान में मनी-लॉन्ड्रिंग विरोधी कानूनों और आतंकवाद के वित्तपोषण का मूल्यांकन करने के लिए आज ३ नवंबर को निर्धारित ‘म्युचुअल रिव्यू इवेल्युशन’ (एमईआर) से पहले, एक शैडो रिपोर्ट एफएटीएफ को भेजी गई है। इस रिपोर्ट में देश में मोदी सरकार द्वारा गैर-लाभकारी संगठनों (एनपीओ) को निशाना बनाने और उन्हें दबाने के लिए अपने कानूनों को हथियार बनाने का खुलासा किया गया है। गौरतलब है कि ‘एमईआर’ मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फंडिंग और सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार से निपटने के लिए किसी देश के उपायों का आकलन है। एमईआर के बाद जून २०२४ में इस बारे में पूर्ण चर्चा होगी। ७०० से अधिक गैर सरकारी संगठनों और क्षेत्र विशेषज्ञों के प्रतिनिधियों के साक्षात्कार पर आधारित इस शैडो रिपोर्ट में पाया गया है कि केंद्र सरकार ‘एफएटीएफ’ के तरीकों के बारे में गैर सरकारी संगठनों को शामिल किए बिना या उन्हें सूचित किए बिना उन्हें अंधाधुंध निशाना बना रही है। बता दें कि एफएटीएफ, सात देशों के समूह (जी-७) देशों द्वारा १९८९ में स्थापित एक अंतरसरकारी संगठन है, जो मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद के फंडिंग आदि से निपटने के लिए वैश्विक कार्रवाई का नेतृत्व करता है।
यह शैडो रिपोर्ट उन कई बिंदुओं की पहचान करती है, जिन पर हिंदुस्थान उसके मानकों का पालन नहीं कर रहा है। इसके अलावा हिंदुस्थान २०१० के एमईआर में की गई सिफारिशों पर कार्रवाई करने में विफल रहा है। २०१० में एमईआर ने विशेष रूप से नोट किया था कि हिंदुस्थान के पास अपने वित्तीय संस्थानों का कोई व्यापक मूल्यांकन नहीं था। इसके अलावा, एमईआर ने हिंदुस्थान को आतंकवादी फंडिंग के लिए एनपीओ क्षेत्र का विस्तृत जोखिम मूल्यांकन करने की भी सिफारिश की थी। अध्ययन के मुताबिक, सिफारिश के १३ साल बाद भी हिंदुस्थान ने यह सार्वजनिक नहीं किया है कि उसने एनपीओ क्षेत्र में ऐसे जोखिमों की पहचान करने के लिए कोई काम किया है या नहीं।
हिंदुस्थान ने एमईआर २०१० में कहा था कि यहां एनपीओ के बीच आतंकी फंडिंग का खतरा छोटा है। हालांकि, पिछले दशक में विशेष रूप से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद एनजीओ को लाइसेंस देने से इनकार करने की संख्या २०१० में ४१ से बढ़कर २०२३ में २०,६९३ हो गई है। यह इनकार करने वालों में ५०,००० फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, २०१० के दायरे (नियंत्रण और मुकदमा चलाने) के तेजी से विस्तार के बाद लाइसेंस से इनकार करना संभव हो गया। हालांकि, १९८९ में स्थापित एफएटीएफ में ११ सितंबर, २००१ को अमेरिका में हुए ट्विन टॉवर हमले के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव आया। एफएटीएफ ने अपनी सिफारिशों को संशोधित किया और शुरुआती ४० में नौ विशेष सिफारिशें और जोड़ी गर्इं। उनमें से एक विशेष रूप से एनपीओ से संबंधित थी, जो आतंकवादी फंडिंग के दुरुपयोग के बारे में था। २००८ में एफएटीएफ ने आतंकवादी संगठनों के फंडिंग पैटर्न पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि ‘धन के स्थानांतरण से आतंकवादी नेटवर्क को फायदा हो सकता है’। इस प्वाइंट का विरोध कई संस्थाओं ने इसका विरोध किया, क्योंकि यह विशिष्ट सिफारिश ‘नागरिक समाज संगठनों के लिए खतरा थी, क्योंकि इसने सरकारों को इसकीr आड़ में दमनकारी कानून लाने में सक्षम बनाया। ये डर हिंदुस्थान में सच साबित हुआ।’

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