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आजादी के ७६ वर्ष पाया कम, खोया ज्यादा

डॉ. सुषमा गजापुरे `सुदिव’
यह अत्यंत महत्वपूर्ण और आनंद की बात है कि १५ अगस्त, २०२३ को भारतवर्ष की आजादी के ७६ वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। भारतवर्ष को आजादी बड़ी कठिनाई से मिली थी, बड़े संघर्षों के बाद एक मुक्त आकाश में भारतीयों ने अपने पंख पसारे थे। स्वतंत्र भारत की स्थापना हेतु न केवल हमारे महान नेताओं, बल्कि भारत की जनता ने भी कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिन्हें हम कभी भी भुला नहीं सकते। देश को आजाद कराने की भावना नेताओं और लोगों में इतनी अधिक गहरी थी कि जनता ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था इसलिए कि हम एक आजाद देश में खुली सांस ले पाएं, एक सामान्य जीवन व्यतीत कर पाएं।
सर्वप्रथम हमें यह देखना होगा कि स्वतंत्र भारत में हमें क्या मिला? स्वतंत्र भारत में सर्वप्रथम हमें रियासतों का एकीकरण मिला और उसके उपरांत एक सशक्त संविधान मिला। ऐसा संविधान जिसने देश की आगे की यात्रा के लिए एक रोडमैप दिया। इस संविधान ने स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के विचारों को इसकी नींव में स्थान दिया और एक ऐसा ग्रंथ (संविधान) रचा जो आज भी विश्व का सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक ग्रंथ माना जाता है, जिसने हमें हमारे कर्तव्यों और अधिकारों का बोध कराया। इसी ने हमें जीने के अधिकार से परिचित कराया। सुनने में यह बहुत सरल शब्द है कि जीने का अधिकार मिलना चाहिए। किंतु इस जीने के अधिकार में अनेक बिंदु और मुद्दे हैं, जिन्हें हमें जानना आवश्यक है।
भारतीय संविधान की जब आधारशिला रखी जा रही थी, उस समय देश के संविधान के साथ ही लोगों के ‘जीने के अधिकार’ को भी पूरी तरह से ध्यान में रखा गया। इन सबसे प्रेरणा लेकर संविधान निर्माताओं ने जीवन के सभी मूल अधिकारों को संविधान में समाविष्ट किया। इन्हें देश के संविधान में स्थान दिया और संविधान में संशोधन की प्रक्रिया के अतिरिक्त इनमें किसी भी प्रकार का अनावश्यक संशोधन नहीं किया जा सकता था इसलिए इन अधिकारों को ‘मौलिक अधिकार’ भी कहा जाता है। यह सभी मौलिक अधिकार सभी लोगों के लिए समान रूप से निर्धारित किए गए थे। इनके अभाव में किसी भी नागरिक का व्यक्तित्व-विकास बाधित हो सकता है, इन अधिकारों का किन्हीं भी हालातों में उल्लंघन भी नहीं किया जा सकता।
आइए, अब बात करेंगे हमने आजादी मिलने के पश्चात क्या खोया, क्या पाया। सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्र भारत में हमें अपना स्वयं का सशक्त संविधान तो मिला लेकिन देश के कई सत्ताधारियों ने इस संविधान को कई बार तोड़ने का प्रयत्न भी किया। कभी सफल हुए तो कभी नहीं, किंतु यह प्रयत्न करना भी लोकतंत्र का अपमान ही है। आजादी के पहले और बाद में भी देश में अत्यधिक गरीबी हुआ करती थी। अनेक लोग भुखमरी के शिकार हो जाते थे लेकिन धीरे-धीरे आजादी के बाद हमारा देश खाद्यान्न में आत्म-निर्भर हुआ। कृषि की उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई। वर्ष १९७१ में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में भारत की बड़ी विजय ने भी हमें गौरवान्वित किया। १८ मई, १९७४ को और ११-१३ मई, १९९८ को परमाणु परीक्षण कर भारत ने दुनिया को चकित कर दिया। वर्ष १९७५ को सिक्किम का भारत में विलय भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। आजादी के पहले देश में अत्यंत गरीबी, निरक्षरता व्याप्त थी, जिस पर आजादी के बाद बहुत ध्यान दिया गया। शिक्षा के लिए अनेक पाठशालाओं का निर्माण हुआ, जिससे साक्षरता बढ़ी। गांवों तक सड़कें बनी, अस्पताल बने, पंचायतों की स्थापना हुई, शिक्षा क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आया, भारतीय महिलाओं में साक्षरता बढ़ी, आत्मनिर्भरता बढ़ी, इसके साथ ही महिलाओं का प्रत्येक क्षेत्र में उत्थान और सब जगह प्रगतिशीलता दिखाई देने लगी। देश में कई आधारभूत संरचनाओं का विकास हुआ। तकनीकी, शोध-अनुसंधान और विज्ञान में जागरूकता आई। इस तरह देश में कई कल-कारखानों की स्थापना हुई, जिससे रोजगार का निर्माण हुआ और इसी से भारत वर्ष की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ। किंतु ‘अमृत महोत्सव’ के दौरान और उससे थोड़ा पहले से भी कुछ नकारात्मक मुद्दे भी देश की व्यवस्था में टाट के पैबंद जैसे दिखाई देने लगे। वर्ष १९७५ जिसमें इंदिरा गांधी द्वारा अचानक इमरजेंसी घोषित करना सबसे अधिक दुखद था। वर्ष १९६२ में भारत-चीन सीमा विवाद के परिणामस्वरूप जो युद्ध हुआ वह अत्यंत दुखद था, जिसमें भारत की हार हुई किंतु उसके पश्चात भारत पुन: नई शक्ति के साथ उभरकर आया।
आज भारत वर्ष वह नहीं है जैसा हमने उसे आजादी के बाद की कल्पना की थी, इन ७६ वर्षों में बड़े सकारात्मक परिवर्तन हुए लेकिन जब सत्ताधारियों को सत्ता सजी-सजाई एक प्लेट में मिल जाए तो वे उस सत्ता को अपनी बपौती मान लेते हैं और लोकतंत्र का उपहास करते हैं और सत्ता में रहने के लिए जनता की भावना के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकते। इसी क्रम में समय के साथ-साथ देश में कुछ सत्ताधारियों द्वारा धार्मिक और सांप्रदायिक द्वेष-भावना पैâलाने का कार्य हुआ, जो अब धीरे-धीरे पूरे भारत में व्यापक रूप से पैâल गया है और जिसकी आग में भारत की जनता को झोंक दिया गया है। सामाजिक विभाजन भी धीरे–धीरे भारत को कमजोर कर रहा है। शिक्षा और चिकित्सा के लिए बहुत कम बजट गुणात्मक शिक्षा और उत्तम चिकित्सा सेवा में बाधक बना रहा है। पश्चिमी देशों के आधुनिकीकरण का देश में स्वागत किया गया, हर हाथ में मोबाइल आ गया है किंतु इसी समय सोशल मीडिया का दुरुपयोग और महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार चिंता का विषय बन गए हैं। हाल में हुई मणिपुर की हिंसा आज भी दिल में ताजा है और हर भारतीय को द्रवित और उद्वेलित कर रही है। भारत की पहचान हमारी आपसी सौहार्दता, सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुंबकम, जैसे आज कटघरे में खड़े कर दिए गए हैं। आज धार्मिक उन्माद अपने चरम पर है। ‘हिंदू-मुस्लिम-सिख, ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई’ तो जैसे हम भुला ही बैठे हैं। जनता को भड़काने का काम पूरी तरह सत्ताधारियों और नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए किया है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
जनता के मौलिक अधिकारों को तो अब प्राथमिकताओं में रखा ही नहीं जाता। ऐसे में संविधान की गरिमा पर कितनी आंच आएगी, यह ज्वलंत प्रश्न है। क्या एक आम भारतीय को जीने का अधिकार संपूर्ण रूप से मिल पाया है, जो उसका मौलिक अधिकार है जिसमें प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा, जल, आवास, रोजगार, सुरक्षा जैसे कई मुद्दे है, जिनसे आज भी कई भारतीय वंचित हैं? क्यों आज भी ८० करोड़ जनता मुफ्त राशन के लिए सरकार पर निर्भर है? संविधान की आधारशिला जिसमें न्याय, समानता, अभिव्यक्ति की आजादी, बंधुत्व, सम्मान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक आचरण या व्यवहार का जिस तरह हनन हो रहा है वह देश के विकास और प्रगति के लिए बिल्कुल भी सकारात्मक नहीं है। आजादी संघर्ष के बाद मिली लेकिन कुछ अधिक पाने की चाहत में हमने जनता को उसके जीने के अधिकारों से वंचित कर दिया है। देश की प्रगति की यात्रा जारी है और आप और हम सब मिलकर ही इस देश और लोकतंत्र को बचा सकते हैं और इसके लिए हम सबकी ओर से नई वचनबद्धता की जरूरत होगी। आजादी के ७६ वर्ष की आप सभी को शुभकामनाएं। जय हिंद! वंदे मातरम!
(स्तंभ लेखक आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक है)

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