इम्तिहान

हर पल जिंदगी में इम्तिहान आया
जैसे किसी ने जाल बिछाया
सफल होंगे या असफल
कुछ पता नहीं लग पाया
कदम-कदम चलते गए
बहुत दूर निकल गए
रुकना नसीब में नहीं आया
सांस लेने की फुर्सत कहां थी
जब सामने खड़ा तूफ़ान आया
जब-जब फैसला लिया
तब-तब बखेड़ा हुआ
पर उससे निपटना आ ही गया
तपिश थी मन में कुछ पाने की
पर हर पथ पर धोखा नजर आया
जिज्ञासा को मुठ्ठी में बंद कर के
कोई कुछ बिगाड़ न सका
उसे हासिल करना आ ही गया
पीछे मुड़ना फिसूल था
आगे का रास्ता अंजाम भरा
दिख ही गया
इच्छाओं को हथेली की लकीरों में
डाल कर उसे पूर्ण करना आ ही गया।

गैरियत या अपनापन

फिसलती हुई जिंदगी को
कैसे पटरी पर लाएं
हवा का रुख मोड़ कर
क्या ऐसे इसे समझाए
दिन ढल गया शाम हो गई
किसी का सोना किसी की चांदी हो गई
हमने कब हीरा मांगा
बस मोती का टुकड़ा चाहा
उसको भी आने में देर हो गई
बहारें भी पतझड़ बन गई
सूख गया मन का चमन
बरखा भी आने में देर कर रही
सूख गया मन का दरिया
दर्दे दिल कोई समझ न पाया
जख्मों को हरा रख गया
सवालों जवाबों में जिंदगी कट रही
किसी की ढोल किसी की बैंड बज रही
सौंधी-सौंधी हवा चली
कुछ कहने कुछ सुनने चली
फिजा खिजां से गुजारिश कर रही
मुझको आवन दे खुद को जावन‌ दे
अरमानों की बरसात हो रही
पूरी या आधी सौगात मिल रही
किसी को चुनौती
किसी को आरजू मिल रही
गैरों से उम्मीद जगी
अपनों से उम्मीद हटी
किसको समझाए समझ नहीं आता
समझ वाला कोई नजर नहीं आता।
-अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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