शीतल अवस्थी
सावन के सोमवार को भगवान शंकर की अराधना सर्वथा कल्याणकारी है, जिससे भक्त मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं। इस माह में सोमवार का दिन विशेष महत्व रखता है। सोमवार को शिव उपासना की कृपा प्राप्ति का द्वार माना गया है। जो देवों के भी देव हैं, महादेव हैं अर्थात भगवान शिव हैं। हालांकि, वर्ष में प्रत्येक महीने शिव उपासना किसी न किसी रूप में चलती ही रहती है, लेकिन पूरा सावन शिव उपासना का ही महीना कहलाता है।
सोमवार शिव उपासना का विशेष दिन है। इस दिन शिव आराधना का बहुत ही शुभ फल मिलता है। इसलिए सुबह स्नान के बाद भगवान शंकर के साथ माता पार्वती और नंदी को गंगाजल या पवित्र जल चढ़ाना चाहिए। सावन में आशुतोष भगवान शंकर का जो प्रतिदिन पूजन न कर सके तो कम से कम उसे सोमवार को शिव पूजन अवश्य ही करना चाहिए और व्रत रखना चाहिए, क्योंकि सोमवार भगवान शंकर का प्रिय दिन है। मासों में श्रावण मास भगवान शंकर को विशेष प्रिय है और इस मास में भी सोमवार उन्हें अधिक प्रिय है। अत: सावन के सोमवार को हर हाल में शिव आराधना करना चाहिए। इस सावन के दो ही सोमवार अभी शेष हैं। वैसे सावन में प्रतिदिन शिवोपासना का विधान है।
सोमवार चंद्रवार है, इसीलिए चंद्रमा को तृप्त करने के लिए कावरिए अपनी कावरों में घंटियां बांधे हुए `हर बम’ `हर हर महादेव, `बोल बम’ `ॐ नम: शिवाय’ आदि कहते हुए शिवधाम जाते हैं। श्रावण में पार्थिव शिव पूजा अर्थात पवित्र मिट्टी से शिवलिंग स्थापित कर उन पर विधिवत पूजन का विशेष महत्व है। अत: प्रतिदिन अथवा प्रति सोमवार तथा प्रदोष को शिव पूजा या पार्थिव शिव पूजा अवश्य करनी चाहिए। इस मास में लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ कराने का भी विधान है। श्रावण में जितने भी सोमवार पड़ते हैं उन सबमें शिवजी का व्रत किया जाता है। इस व्रत में प्रात: गंगा स्नान अन्यथा किसी पवित्र नदी या सरोवर में अथवा विधिपूर्वक घर पर ही स्नान करके शिव मंदिर में जाकर स्थापित शिवलिंग का या अपने घर में पार्थिव मूर्ति बनाकर यथाविधि षोडशोपचार पूजन किया जाता है। यथासंभव विद्वान आचार्यों से रुद्राभिषेक पूजन किया जाता है। इस व्रत में श्रावण माहात्म्य और शिव महापुराण की कथा सुनने का विशेष महत्व है। पूजन के पश्चात संत एवं विद्वानों को भोजन कराकर एक बार ही भोजन करने का विधान है। भगवान शिव का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जिन्होंने इस व्रत को किया, वही इसका महत्व समझते हैं।
आज श्रावण का तीसरा सोमवार है। साथ ही शुक्ल पक्ष की तृतीया होने से हरियाली तीज भी है। मान्यता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन देवी पार्वती ने सौ वर्षों की तपस्या-साधना के पश्चात भगवान शिव को पाया था। इसी मान्यता के अनुसार, स्त्रियां इस दिन मां पार्वती का पूजन करती हैं। इस त्योहार पर मेहंदी अवश्य लगाई जाती है। रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनी जाती हैं। नवविवाहित पुत्री की ससुराल से उसके लिए सिंगारा आता है। जगह-जगह तीज मिलन का आयोजन होता है। महिलाएं गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं, हास-परिहास करती हैं। इस तरह हंसी-खुशी तीज का त्योहार मनाया जाता है। तीज के दिन स्त्रियां स्नानादि से निवृत होकर श्रृंगार करती हैं, नई चूड़ियां पहनती हैं। नए सुंदर वस्त्र, गहने पहनकर मां गौरी की पूजा करती हैं। इसके लिए मिट्टी के शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजी बनाकर उनको वस्त्रादि पहनाकर रोली, सिंदूर, अक्षत आदि से पूजन करती हैं।
