अल्पविराम

पास होकर भी जो न रहे दिल के करीब,
कसमें खाई कभी साथ मिल के हमने
पर दिल में रखा न कभी दोनों ने एहतराम,
रखा रिश्तों में सदा इक अल्पविराम!
रहे वो सदा सियासत में शरीक अब तक,
भूल गए ये हकीकत कि सांस लेने का हक,
सितम सहने वाले का भी है इस जहान में,
समझा नहीं इंसा कि गैरजरूरी होते हैं अल्पविराम!
गजब की रवायत है खताओं का रखें हिसाब तो
बे रौनक हो जाती है खुद की सांसों की रफ्तार,
आओ परख लेते हैं खुद की हैसियत इक बार,
जरूरी नहीं है रिश्तों में सदा रहे अल्पविराम!
चाहा था इक हमसफर वफा ए इश्क के लिए,
निभा रहा रिश्ता हर कोई खुदगर्जी की खातिर,
कि कब कहां-किससे क्या काम पड़ जाए,
रखता इसीलिए हर शख्स रिश्तों में अल्पविराम!

मुनीष भाटिया, 
मोहाली

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