मुख्यपृष्ठनए समाचारकोविड से भी खतरनाक समय आनेवाला है! ... आईएमएफ ने जताई मंदी...

कोविड से भी खतरनाक समय आनेवाला है! … आईएमएफ ने जताई मंदी की आशंका

सामना संवाददाता / मुंबई
कोरोना काल में कई लोगों ने अपनों को गवां दिया तो लॉकडाउन से रोजगार छिन जाने से कई अन्य का जीवन जहन्नुम बन गया है। उस पर बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है। इससे ऐसी आशंका जताई जा रही है कि कोविड काल से भी मुश्किलों भरा समय आनेवाला है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने दुनिया पर बढ़ते मंदी के जोखिम को लेकर चेतावनी दी है। आईएमएफ प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने वैश्विक नीति निर्माताओं से खतरनाक ‘न्यू नॉर्मल’ से बचने के लिए नीतिगत कार्रवाई करने की अपील की है। अगले हफ्ते होनेवाली वार्षिक बैठक से पहले उन्होंने इस संकट के निपटने के लिए मिलकर काम करने की बात दोहराई। आईएमएफ चीफ ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को बीते कुछ समय में एक के बाद एक कई बड़े झटके झेलने पड़े हैं। इससे दुनियाभर में मंदी का जोखिम काफी बढ़ गया है। ऐसे में खतरनाक ‘न्यू नॉर्मल’ से बचने के लिए ठोस उपाय उठाने होंगे, क्योंकि ग्लोबल इकोनॉमी को स्थिर करना बहुत जरूरी है। इस दौरान क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने बढ़ती महंगाई (मुद्रास्फीति) का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और क्लाइमेट चेंज जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। क्रिस्टालिना ने कहा कि महंगाई जैसी चुनौतियों से हमें जल्द निपटना होगा। अगर केंद्रीय बैंक महंगाई को रोकने के लिए आक्रामक तरीके से ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना जारी रखते हैं, तो यह लंबे समय तक आर्थिक मंदी की वजह बन सकता है। आईएमएफ ने बढ़ती महंगाई और मामूली वेतन वृद्धि के संयोग पर चिंता जताई है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम में बोलते हुए क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने सबसे तात्कालिक चुनौतियों का समाधान करके ग्लोबल इकोनॉमी को स्थिर करने को जरूरी करार दिया।

बढ़ रही है गरीबों की तादाद
विश्व बैंक के ताजा अनुमान के मुताबिक कोविड-१९ महामारी के कारण २०२० में करीब ५.६ करोड़ भारतीय अत्यंत गरीबी में धंस गए, जिससे दुनियाभर में गरीबों की संख्या बढ़कर ७.१ करोड़ हो गई। दूसरे विश्व युद्ध के बाद गरीबी कम करने के मामले में यह साल सबसे खराब रहा। विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल ने ट्वीट में कहा, ‘२०३० तक अति गरीबी खत्म करने का वैश्विक लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा क्योंकि तब तक करीब ६० करोड़ लोग गरीबी में फंसे होंगे।’ योजना आयोग के पूर्व सदस्य एनसी सक्सेना ने कहा कि ‘स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए कई आकलन से पता चलता है कि वैश्विक महामारी के दौरान २७.५ से ३० करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी रेखा के दायरे में आ गए। नीति आयोग के अपने बहुआयामी गरीबी सूचकांक के तहत भी करीब २५ फीसदी लोगों की पहचान गरीब के तौर पर की गई है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन में युद्ध और खाद्य एवं ऊर्जा कीमतों में तेजी से स्थिति कहीं अधिक खराब हुई है। जबकि कोविड के कारण ७.१ करोड़ लोगों को गरीबी ने घेरा है।

डॉलर बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी
डॉलर महंगा या सस्ता होने पर देश के आयात पर सीधा असर करता है। इसका असर अर्थव्यवस्था की करंट अकाउंट डेफिसिट पर भी दिखेगा। आयात महंगा होने से विदेश से देश में खरीदी जानेवाली वस्तु एवं सेवाएं और महंगी हो जाएंगी। इसका असर आनेवाले समय में घरेलू बाजार में पेट्रोल डीजल की कीमतों पर भी पड़ेगा। जैसे कि भारत अपनी जरूरत का लगभग ८० फीसदी क्रूड आयल आयात करता है। इसका भुगतान डॉलर में करना होता है। यदि डॉलर महंगा होता है तो हमें ज्यादा कीमत देनी पड़ती है।

अन्य समाचार