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मिशन मून के बाद अब सूरज की बारी! … ‘लैग्रेंज प्वाइंट’ तक जाएगा स्पेसक्राफ्ट

इसरो का चंद्रयान-३ मिशन काफी पेचीदा है। इस मिशन के जरिए हिंदुस्थान का रोवर चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंच गया है। चंद्रमा के साउथ पोल पर लैंड करना काफी चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि यहां की जमीन न सिर्फ बड़े-बड़े क्रेटर से भरी हुई है, बल्कि सतह भी ऊबड़-खाबड़ है। हालांकि, चंद्रयान की सफलता के बाद इसरो इससे भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण मिशन को अंजाम देगा। दरअसल, इसरो अगस्त के आखिर में या सितंबर की शुरुआत में आदित्य एल-१ मिशन को लॉन्च करने वाला है। ये इसरो का अब तक का सबसे जटिल मिशन होने वाला है। आदित्य एल-१ मिशन के जरिए सूर्य तक जाया जाएगा। इस मिशन के जरिए हिंदुस्थान पहली बार सौरमंडल में ‘स्पेस ऑब्जर्वेटरी’ तैनात करेगा। आदित्य एल-१ स्पेसक्राफ्ट का काम सूरज पर २४ घंटे और सातों दिन नजर रखना होगा।
हिंदुस्थान ने आज तक लैग्रेंज प्वाइंट तक स्पेसक्राफ्ट नहीं भेजा है। लैग्रेंज प्वाइंट स्पेस के दो या दो से ज्यादा विशाल चीजों (जैसे सूर्य और पृथ्वी के बीच) के बीच एक प्वाइंट है। यहां अगर किसी स्पेसक्राफ्ट को भेजा जाता है, तो वह दो विशालकाय वस्तुओं के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की वजह से एक जगह रहती है। आदित्य स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी से १५ लाख किलोमीटर दूर भेजा जाएगा। स्पेसक्राफ्ट को इस प्वाइंट पर टिकाए रखना बहुत मुश्किल होता है। पृथ्वी-सूर्य के बीच पांच लैग्रेंज प्वाइंट हैं, जिसमें आदित्य को लैग्रेंज-१ तक भेजा जाएगा। आदित्य एल-१ स्पेसक्राफ्ट में दो प्रमुख उपकरण लगे होंगे। इन्हें भारतीय वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। आसान भाषा में कहें, तो इस उपकरण के जरिए सूर्य के चुंबकीय फील्ड की स्टडी होगी। ऐसा पहली बार होगा, जब कोई देश सूर्य के चुंबकीय फील्ड की स्टडी करेगा।
क्यों जरूरी है सूर्य की स्टडी?
आदित्य एल-१ स्पेसक्राफ्ट एक स्पेस टेलिस्कोप की तरह होगा। इस मिशन के दो मुख्य काम हैं। इसमें पहला लंबे समय तक सूर्य की साइंटिफिक स्टडी करना और दूसरा हमारे सैटेलाइट्स को बचाना। दरअसल, सूर्य से रेडिएशन और सौर तूफानों का खतरा है। इनकी वजह से पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद सैटेलाइट्स खराब हो जाती हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि सौर तूफानों की वजह से इलेक्ट्रिकल ग्रिड में भी खराबी आ जाती है। अब ऐसा क्यों होता है और इससे वैâसे बचा जा सकता है, इस मिशन में असकी स्टडी की जाएगी। सूर्य से सौर तूफान का ही खतरा नहीं है, बल्कि इसकी वजह से होने वाले कोरोनल मास इजेक्शन और सौलर फ्लेयर्स भी पृथ्वी के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। ये रेडियो कम्युनिकेशन को खराब कर सकते हैं। अंतरिक्ष में मौजूद एस्ट्रोनॉट्स को भी इनसे नुकसान पहुंच सकता है। आदित्य का काम इन्हीं गतिविधियों पर नजर रखना है। एक तरह से ये वार्निंग सिस्टम के तौर पर काम करेगा।

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