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पीएम मोदी के ‘चीता प्रोजेक्ट’ के बाद अब … बाघों पर भी मंडराया खतरा!

२०२३ में हुई १७७ बाघों की मौत 
सबसे अधिक ४५ मौतें महाराष्ट्र में
पर्यावरण मंत्रालय ने जारी की रिपोर्ट
सामना संवाददाता / नई दिल्ली 
दुनिया में सबसे अधिक बाघों की संख्या हिंदुस्थान में पाई जाती है। साथ ही पीएम मोदी ने ‘चीता प्रोजेक्ट’ के तहत लुप्त हो चुके चीतों को विदेशों से मंगा कर हिंदुस्थान लाया था। लेकिन इसी बीच पर्यावरण मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है जो कि चौंकानेवाली है, साथ ही पीएम मोदी के वन्यजीव संरक्षण नीति पर सवाल भी खड़े करती है। रिपोर्ट के अनुसार, साल २०२३ में १७७ बाघों की मौत हुई है, जिसमें ४५ मौतें सिर्फ महाराष्ट्र में हुई है। मरनेवाले कुल बाघों में से ४० प्रतिशत बाघ या तो शावक थे या किशोर। हालांकि, कुछ जब मीडिया रिपोर्टों में इस साल बाघों की मौत के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया तो उसके बाद पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से ये आंकड़े जारी किए गए। यानी चीता प्रोजेक्ट के बाद अब बाघों के संरक्षण पर भी खतरा मंडरा रहा है।
इन राज्यों में हुई मौतें 
जिन राज्यों में बाघों की सबसे अधिक मौते हुई हैं, उनमें महाराष्ट्र में ४५ के बाद मध्य प्रदेश में ४०, उत्तराखंड में २०, तमिलनाडु में १५ और केरल में १४ बाघ शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि साल २०२३ में देश में १७७ बाघों की मौत हुई है, जिसमें सबसे ज्यादा ४५ बाघों की मौत महाराष्ट्र में दर्ज की गई है। मंत्रालय ने बताया कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में २५ दिसंबर, २०२३ तक देश में बाघों की मौत का आंकड़ा २०२ बताया गया है, जो कि गलत है। मंत्रालय के अनुसार, भारत अब दुनिया के ७० प्रतिशत से अधिक जंगली बाघों का घर है। देश में कम से कम ३,१६७ बाघ हैं।
अभयारण्यों की कुल संख्या ५४ 
भारत में बाघ प्रतिवर्ष ६ प्रतिशत की स्वस्थ दर से बढ़ रहे हैं, जो विभिन्न प्राकृतिक कारणों से बाघों की हानि को संतुलित करता है और निवास स्थान की वहन क्षमता के अनुसार ही बाघों की आबादी को बनाए रखता है। देश में बाघ अभयारण्यों की कुल संख्या ५४ है, जिसका क्षेत्रफल ७८ हजार वर्ग किमी से अधिक है। यह भारत के भौगोलिक क्षेत्र के २.३० प्रतिशत से अधिक को कवर करता है।

‘प्रोजेक्ट चीता’ फेल?
भारत का ‘प्रोजेक्ट चीता’ उस समय सवालों के घेरे में आ गया जब एक के बाद एक कुल ४ महीने के भीतर ८ चीते चल बसे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के मौके पर १७ सितंबर २०२२ को कूनो नेशनल पार्क में पहली बार चीतों को छोड़ा था। बहुत से लोग भारत के प्रोजेक्ट चीता पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ लोग इसे सरकार की लापरवाही बता रहे हैं, तो कुछ लोग इसे कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए उपयुक्त स्थान न होना बता रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत सरकार का प्रोजेक्ट चीता खतरे में पड़ गया है?

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