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अजर अमर सिनेमा युग

अब नहीं सिनेमा का क्रेज रहा,
अब नहीं फिल्मों में पहले सा दम रहा
न गीतों में, न संवादों में वो कशिश रही
न दिलीप रहा न राज, राजेन्द्र, न अशोक, देव रहा
गुरू दत्त, धर्मेन्द्र, राजेश, अमिताभ,
न कोई सुनिल दत्त सा ‘सदाबहार नायक’
बड़े पर्दे पर नज़र आ रहा है…
न नरगिस रही न सुरैया, वैजयंती, वहीदा मधुबाला,
न राखी, न रेखा सायरा, शर्मीला, नंदा
लता रही न रफी रहा, साहिर, शकील, राजेंद्र, शैलेंद्र
न हसरत रहा, न कवि प्रदीप रहा,
भरत व्यास, न कैफी आजमी
न मजरूह सुल्तानपुरी रहे…
संगीत की दुनिया में, न शंकर रहा
न जय किशन रहा, न नौशाद, एस डी बर्मन रहा,
न ‘ओ पी’ रहा न ‘आर डी’ रहा नि सी रामचंद्र,
शलील चौधरी, ख़याम, जयदेव ही रहे,
चित्रगुप्त, रोशन, रवि, मदनमोहन आलोप हुए।
लक्ष्मीकांत नहीं, कल्याण जी नहीं,
स्वर्णिम युग सिनेमा का अब सिर्फ
सुहानी यादों का पिटारा बनकर
रह गया है हमारे मस्तिष्क में।
ज़ेहन में आज भी वो चलचित्र
बराबर चल रहे हैं…अब ना बन पाए मदर इंडिया,
मुगल ए आज़म, नवरंग…
न कोई निर्मित कर सके अनारकली,
कोहिनूर, बैजू बावरा… गंगा जमुना,
संगम, उपकार, बूट पालिश, श्री ४२०,
चोरी चोरी, शोले, दिलवाले दुल्हनिया
और हम आपके हैं कौन को भला क्यों
और कैसे कोई पर्दे पर दोहराये…
न ही दोहरा सकता है।
मुकेश, हेमंत, मन्नाडे और किशोर का वो ‘सुरीला सारथक सिनेमा’ वाला युग लद गया। अब ना कोई हेमा, साधना, मुमताज या नूतन सिनेमा की शान बढ़ाये।
ना कोई राजकुमार, शम्मी, शशी कपूर,
प्राण, मनोज, संजीव कुमार जैसा अभिनय का लोहा मनवाए।
जिस तरह ज़िंदगी नहीं मिलती दुबारा दोस्तों,
सिनेमा का खोया युग भी वापस हाथ नहीं लगने वाला है।
‘श्वेत श्याम’ फिल्में जैसे भाभी, छोटी बहन,
धूल का फूल, अनमोल घड़ी, उड़न खटोला,
वचन, तूफान और दिया, कागज के फूल,
एक ही रास्ता, साहेब बीवी और गुलाम,
दो बीघा ज़मीन, बंटवारा आदि
कैसे भुलाया जा सकता है या
दोहराया जा सकता वो वाला
“अजर अमर सिनेमा युग।”
जब कहानी में सबक हुआ करता था
तब की फिल्में देखने की ललक इतनी
हुआ करती थी कि हर शुक्रवार वाले दिन
टॉकीजों में ‘first day, first show’
के टिकट की लंबी कतारें देखीं जाती थी।
दिल मसोसकर रह जाते थे हम
जब हमारा नंबर आने से पहले ही
‘टिकट खिड़की का कपाट बंद’ हो जाता था।
और हम कई दिनों तक ‘नयी वाली फिल्म’
देखने से वंचित रह जाते थे.
‘ब्लैक’ में टिकट खरीदने की न
तो मेरी क्षमता थी और ये पृवत्ति
शुरू से ही मेरे सिद्धांत के विरूद्ध में रही है।
तब तक ‘तसल्ली’ नहीं होती, जब तक
फिल्म देख नहीं लेते थे।…
कई पिक्चरें तो हम थिएटरों में एक से
अधिक बार देखने को उत्साहित होते रहे हैं
और जुगाड़ लगाकर, पैसे जुटाकर,
दो-तीन बार फिल्म देख भी लेते थे।
मैंने स्वयं भी नवरंग, मुगल-ए-आजम,
जब प्यार किसी से होता है, खानदान,
मिलन, फूल और पत्थर, मदारी, आंखें
वक्त आदि फ़िल्मों का आनंद एक से अधिक बार माना है।
…ख़्वाब हो गये वो दिन…
जो लौटकर न आ सकें, हम उन्हें कैसे बुलाएं?
मगर कभी न भुलाएं।

त्रिलोचन सिंह अरोरा

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