मुख्यपृष्ठसंपादकीयअजीत दादा का विकास!

अजीत दादा का विकास!

विकास के लिए हम शिंदे-फडणवीस के साथ गए, ऐसा दावा उपमुख्यमंत्री दादा पवार ने किया है। यह दावा खोखला एवं बेबुनियाद है। अजीत पवार को विकास की चाह है, यह स्वीकार है परंतु बीते कई वर्षों में सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने विकास का ऐसा कौन-सा कीर्तिमान बनाया? बारामती में जाकर अजीत दादा ने ऐसा भी कहा कि मुझे सत्ता की भूख नहीं है। मैं सत्ता के लिए हवस रखनेवाला कार्यकर्ता नहीं हूं। शाहू-फुले-आंबेडकर आदि महान विभूतियों के विचार हम आगे बढ़ानेवाले हैं। दरअसल, महाराष्ट्र सहित देशभर में धार्मिक उन्माद भड़काकर दंगे कराना यह भाजपा का एकसूत्रीय कार्यक्रम है। लोगों को धर्म-जाति के नाम पर लड़ाना, ये शाहू-फुले-आंबेडकर के विचार नहीं थे। स्कूलों में द्वेष के सबक कैसे सिखाए जाते हैं यह उत्तर प्रदेश के प्रकरण से सामने आया है। शिक्षिका के कहने पर मुस्लिम छात्र को कक्षा के उसके सहपाठी मित्रों ने बेरहमी से पीटा, ऐसा जहर आज समाज में सर्वत्र फैलाया जा रहा है और ये शाहू-फुले-आंबेडकर के विचार निश्चित ही नहीं हैं। आज हर स्तर पर संविधान को रौंदकर एक तरह से तानाशाही पद्धति द्वारा राजकाज चलाया जा रहा है इसलिए भाजपा के साथ गए अजीत पवार डॉ. आंबेडकर के किन विचारों को वे आगे ले जाना चाहते हैं, यह उन्हें महाराष्ट्र को खुलकर बताना चाहिए। शनिवार को बारामती में अजीत पवार का जोरदार स्वागत हुआ। बारामती के होम ग्राउंड पर इस तरह से स्वागत का तामझाम कराना चाहिए, ऐसा श्री अजीत पवार को क्यों लगा? अब तक कम से कम चार बार उपमुख्यमंत्री बने और शरद पवार की कृपा से उन्हें सत्ता के तमाम पद मिलते रहे। उस दौरान अजीत दादा द्वारा होम ग्राउंड पर खुद का इस तरह से स्वागत करवाना नजर नहीं आया, बल्कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को जोर देकर कहा कि सत्कार, हार-फूल वगैरह नहीं चाहिए। काम में जुट जाना है। लेकिन भाजपा के पलंग पर जाने के बाद से अजीत पवार पर सत्कार की सनक सवार हो गई है। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने भी अजीत पवार की मजेदार चुटकी ली है’ ‘अजीत पवार को कितनी भी बार उपमुख्यमंत्री बनने के लिए कहो, वे हमेशा तैयार रहते हैं। मुझे उन पर दया आती है।’ श्री कोश्यारी को महाराष्ट्र के नेता की इस तरह से खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए। महाराष्ट्र के राज्यपाल के पद पर बैठकर उन्होंने राजनीति की, उनकी वह मस्ती अभी तक उतरी नहीं है। अजीत पवार को भगतसिंह को तीखा जवाब देना चाहिए। लेकिन उतना बल उनमें है क्या? भाजपा जो लिखकर देगी उसी एजेंडे पर उन्हें काम करना है और शाहू-फुले-आंबेडकर के विचार उस एजेंडे में नहीं हैं। फिर भी कोश्यारी को अजीत पवार पर दया आती है, लेकिन इंस्पेकट्र से सिपाही बन चुके देवेंद्र फडणवीस पर उन्हें दया नहीं आती। श्री अजीत पवार का जो कहना है कि मुझे सत्ता की हवस नहीं है। वह सही है तो उन्होंने विधायकों को एकत्रित करके अपने चाचा की पार्टी क्यों तोड़ी? जो पार्टी काका ने स्थापित की, उन्हीं काका को पार्टी के अध्यक्ष पद से क्यों हटा दिया? अब सुनील तटकरे ने खुलासा किया है कि अजीत पवार ही राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सत्ता की भूख नहीं होने के ये लक्षण बिल्कुल भी नहीं हैं। अजीत पवार को सत्ता की ‘हवस’, ‘भूख’ नहीं होती तो उन्होंने सीधे राजनीति से संन्यास लेकर कृषि, समाजिक कार्यों में खुद को झोंक दिया होता और यदि वे ईमानदार, स्वाभिमानी राजनीतिज्ञ होते तो चाचा की मेहनत पर ‘डाका’ डालने के बजाय खुद की नई वैश्विक पार्टी स्थापित करके अलग राजनीति की होती, लेकिन अजीत पवार को सबकुछ तैयार मिला है। एकनाथ शिंदे से भाजपा ने जो अनैतिक और डराने-धमकानेवाला काम करवाया। वही काम अजीत पवार से करवाया। असल में जिस तरह से शिवसेना गद्दार गुट की नहीं है उसी तरह से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अजीत पवार गुट की नहीं है। शिवसेना सिर्फ और सिर्फ बालासाहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे की ही और राष्ट्रवादी कांग्रेस शरद पवार की ही पार्टी रह सकती है परंतु भाजपा ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए ‘वार’ किया इसलिए आपकी सत्ता की यह ‘हवस’ पूरी हुई है, यह पार्टी पर झूठा दावा करनेवालों को याद रखना चाहिए। इसलिए हमें सत्ता की भूख नहीं है आदि अजीत पवार का बोलना झूठ है। शिंदे और अजीत पवार ये किसी महान विचारों के कारण पार्टी से बाहर नहीं निकले, बल्कि ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई आदि की जांच नहीं चाहिए। इस डर से उन्होंने घुटने टेके यह बारामती में उनपर फूल बरसानेवाली जनता भी जानती है। सवाल रहा विकास आदि का। शिंदे-अजीत पवार के विकास की व्याख्या मतलब महाराष्ट्र की तिजोरी से ठगी और लूट है। अपने गुट के बागी विधायकों को ही करोड़ों की निधी देना और उस निधि में कमीशनबाजी से महाराष्ट्र में बेईमानी के बीज को बढ़ाना। जो विधायक अपने गुट में नहीं है उनके निर्वाचन क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए एक फूटी कौड़ी नहीं देना। वहां के मतदाताओं को विकास से दूर रखना, ऐसी जालसाजी राज्य के मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्री कर रहे हैं। अब यह विकास है, यदि ऐसा अजीत पवार को लगता है तो वे शाहू-फुले-आंबेडकर के विचारों का घोर अपमान कर रहे हैं। सत्ता द्वारा तानाशाही पद्धति से जुटाई गई अपार संपत्ति पर ईडी, इनकम टैक्स की चीटियां चढ़ गईं, उन चीटिंयों द्वारा काटे जाने पर भाजपा के समूह में शामिल होनेवालों को एक बात याद रखनी चाहिए कि निश्चित तौर पर २०२४ में सत्ता परिवर्तन होनेवाला है और शरद पवार के कहे अनुसार ‘आज कपाट में डाली गई फाइलें फिर से टेबल पर आएंगी।’ महाराष्ट्र के ही नहीं, बल्कि देश के बेईमानों को तब क्षमा नहीं मिलेगी! सत्ता की भूख तब तक सभी को शांत कर लेनी चाहिए। यही सभी के लिए प्यार भरी सलाह है।

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