मुख्यपृष्ठस्तंभमुुंबई मिस्ट्री : खिलाफत आंदोलन के अली बंधु

मुुंबई मिस्ट्री : खिलाफत आंदोलन के अली बंधु

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अली बंधुओं- मौलाना मोहम्मद अली जौहर तथा मौलाना शौकत अली को आदर का स्थान प्राप्त है। मुंबई ने खिलाफत आंदोलन के इन प्रणेताओं को शहर की दो मुख्य सड़कों के रूप में याद रखा है।

विमल मिश्र।  मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली। खिलाफत आंदोलन के पुरोधा। मुंबई ने इन्हें शहर की दो प्रसिद्ध सड़कों के नाम से याद रखा है। मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर मोहम्मद अली रोड (हालांकि इसे १९वीं सदी के महान परोपकारी और शिक्षाशास्त्री नाखुदा मोहम्मद अली रोगे के नाम पर माननेवाले भी हैं।) और मौलाना शौकत अली के नाम पर मौलाना शौकत अली रोड, भायखला की लव लेन स्थित का खिलाफत हाउस, जहां से ज्यादा दूर नहीं है। इसके संस्थापक यही दोनों भाई हैं। १९१९ में जब से महात्मा गांधी ने ईद-ए-मिलाद पर इसके जुलूस की सदारत की, तब से इस दिन यहां से एक विशाल जुलूस निकलता है, जिसकी अगुवाई राष्ट्रीय नेता करते हैं।
आज यहां रहनेवाले बहुत कम लोगों को ‘अली बंधुओं’ के बारे में मालूम है। एक वक्त था, जब देश की राजनीति में महात्मा गांधी, मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली को त्रिमूर्ति समझा जाता था, उसी तरह जैसे कभी ‘लाल-बाल-पाल’-यानी लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल को। वे साथ-साथ देश का भ्रमण किया करते थे और तीनों की जय के नारे साथ-साथ लगते थे। वह दृश्य तो देखने लायक होता था, जब काया में भारी-भरकम ये दोनों भाई भीड़ से बचाने के लिए गांधीजी को बीच में घेरकर चला करते थे। मोहम्मद अली रोड की तरह मौलाना शौकत अली रोड पर भी खान-पान की दुकानों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक साज-सामान व हार्डवेयर स्टोर्स की भरमार है। दोनों अली बंधु (एक तीसरे भाई भी थे) रामपुर के उच्च पदासीन एक प्रसिद्ध घराने की पैदाइश हैं। उनके पितामह मुंशी अली बख्श को ‘गदर’ में अंग्रेजों की सहायता करने पर ‘खानबहादुर’ की उपाधि मिली थी, तब किसे इलहाम था कि उनके पौत्र अंग्रेजों से विद्रोह के लिए कारागार में डाले जाएंगे! शौकत अली १० मार्च, १८७३ और मोहम्मद अली १० दिसंबर, १८७८ को जन्मे शौकत अली अलीगढ़ से बी. ए. पास करके सरकारी मुलाजिम बने। मोहम्मद अली १९०२ में ऑक्सफोर्ड से अंग्रेजी की उच्चतम डिग्री लेकर भारत वापस लौट आए और कुछ समय महाराज बड़ौदा की सिविल सर्विस में काम करने के बाद कलकत्ता जाकर, वहां से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘कामरेड’ निकालने लगे। १९१३ में दिल्ली से उन्होंने उर्दू दैनिक ‘हमदर्द’ भी निकाला और मुसलमानों के अधिकारों की हिमायत के साथ हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रचार करने लगे।
महात्मा गांधी का साथ
देश की आजादी के लिए जो आग मोहम्मद अली के दिल में शुरू से ही धधक रही थी, उसे उनकी जेल यात्राओं ने विकराल कर दिया। मुसलमान भी अपने देश को स्वराज्य दिलाने के लिए दूसरे संप्रदायों की भांति तत्पर हो मुस्लिम लीग ने यह प्रस्ताव १९१३ में उनके आग्रह पर ही मंजूर किया था। इसे परवान चढ़ाया अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी द्वारा उनके नेतृत्व में शुरू किए खिलाफत आंदोलन (१९१९-१९२२) ने। इसका उद्देश्य था इस्लाम का मुखिया माने जाने वाले तुर्की के खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाना। तुर्की और बाल्कन देशों में लड़ाई छिड़ जाने पर मोहम्मद अली एक रेड क्रॉस मिशन लेकर तुर्की गए भी। कमेटी का जो प्रतिनिधिमंडल मार्च, १९२० में इंंग्लैंड गया, उसमें अली बंधु भी थे। खिलाफत आंदोलन को महात्मा गांधी के समर्थन ने प्रबल बना दिया। कमेटी सरकारी नौकरी, सरकारी ओहदे, सरकारी स्कूल, कॉलेजों और सरकारी कचहरियों के बहिष्कार के लिए आंदोलन छेड़, गांधीजी को नेता मानकर कांग्रेस के असहयोग आंदोलन के साथ हो गई।
कांग्रेस अध्यक्ष बने
विद्रोही भाषणों के कारण कराची में देश के छह नेताओं पर मुकदमा चला, जिनमें मोहम्मद अली भी थे। उन्हें दो वर्ष की सजा हो गई। इस मुकदमे में अपनी पैरवी में उन्होंने कहा, ‘हम हिंदुस्थानियों को अपना भाग्य-विधाता खुद होना चाहिए, जबकि ब्रिटिश सरकार इसका विरोध करती है। मैं किसका कानून मानूं? अल्लाह का या ब्रिटिश सरकार का? जब दोनों कानूनों में टकराव है तो मैं फिर अल्लाह का ही कानून मानूंगा।’ १९२३ में जेल से रिहा होकर बाहर आने पर मौलाना को कोकीनाड में हुए कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में कांग्रेस का प्रधान बना दिया गया। जिन दिनों मोहम्मद अली गंभीर रूप से बीमार थे उन्होंने कहा था, ‘मैं अपना देश चाहता हूं, जिसमें मैं लॉर्ड रीडिंग को भी गिरफ्तार कर सकूं। अब यहां से मैं स्वराज्य लेकर लौटूंगा या प्राण देकर।’ बस, यही उनका अंतिम संबोधन था। अगले ही दिन ४ जनवरी, १९३१ को दिमाग की नस फट जाने से उनका देहांत हो गया। मौलाना शौकत अली ने मोहम्मद अली की अंग्रेज स्टेनो से विवाह कर लिया और मुस्लिम लीग में सम्मिलित होकर मोहम्मद अली जिन्ना के साथ हो लिए। २६ नवंबर, १९३८, को उनका देहांत हो गया।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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