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जातिगत जनगणना ने पलटा खेल!

सुषमा गजापुरे

२०२४ का चुनाव नीतिश बाबू ने एक ऐसे दांव से पलट दिया है, जिसकी उम्मीद आज के परिपेक्ष्य में कम ही नजर आ रही थी। चुनावी संतुलन अचानक से बराबरी के मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। वो भाजपा जो आज से पहले लड़ाई में नजर आ रही थी, अब सहमी-सहमी नजर आ रही है। लगता है प्रकृति का चक्र पूरा ३६० डिग्री घूम गया है। भारतीय राजनीति के पटल पर एक समय जातीय राजनीति का पूरा-पूरा प्रभुत्व था, पर कुछ दशक पहले भाजपा ने धर्म का कार्ड खेलकर उसे निरस्त कर दिया। लेकिन बिहार की जातिगत जनगणना ने एक बार फिर से जाति को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है। पुरानी कहावत जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी फिर से चरितार्थ होती नजर आ रही है। शह और मात के खेल में नीतिश कुमार का ये निर्णय २०२४ से पहले एक गेम चेंजर के रूप में भाजपा के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती लेकर आया है। यहां ये भी भूलना ठीक नहीं होगा, जहां मोदी जी ने अभी हाल ही में संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण बिल पास करवाया था और ये सोचा था कि उन्होंने २०२४ का चुनाव पलट दिया है। पर वो उत्साह के क्षण ज्यादा टिक नहीं पाए क्योंकि उसको लागू करने का वर्ष २०२९ के बाद का रखा गया था, जो कि एक प्रकार से महिला वर्ग के प्रति एक छल था और जनता उसे बहुत जल्दी पहचान गई।
भारत में राजनैतिक संघर्ष, सत्ता का संघर्ष दलों को या तो जाति का सहारा लेने को मजबूर करता है या फिर कथित धर्म का सहारा लेकर जाति के प्रभाव को कुंठित करने का प्रयास करते हैं। समय-समय पर राजनैतिक दलों को इन एजेंडों पर चलकर बड़ी सफलताएं भी मिली हैं। पर मतलब की हिंदू राजनीति करनेवाली भाजपा पिछले कुछ दशकों से अजेय बनती जा रही थी और विपक्ष की भारत में यही उलझन थी कि वैâसे कोई नया ब्रह्मास्त्र पैदा किया जाए, जो मोदी के जादू को समाप्त कर सके। मोदी जी ने हिंदू राष्ट्रवाद का खुलकर प्रयोग किया और राजनीति में कुछ ऐसे प्रयोग किए जो इससे पहले कभी आजमाए नहीं गए थे। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की चाशनी २०१४ के बाद लोगों को पसंद भी आई, पर हर तिलस्म एक न एक दिन टूटता ही है। धर्म का तिलस्म भी शायद अब आखिरी मोड़ पर आ गया है, जिसे फिर से जातिगत राजनीति से कड़ी चुनौती मिल रही है।
जाति सर्वेक्षण की मांग करनेवाले राजनैतिक दल इस बात पर जोर देते हैं कि मुख्य रूप से समाज के कमजोर वर्गों के लिए एक नया सही अनुमान आवश्यक है, ताकि देश के संसाधन गरीबों के लिए उचित रूप से खर्च किए जा सकें। जाति जनगणना की मांग का उद्देश्य गैर-उच्च जाति समुदायों, अन्य पिछड़े वर्गों और अत्यंत पिछड़े वर्गों की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करना है। फिलहाल, तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित आरक्षण ५० प्रतिशत है। इसके अलावा १० प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए भी सुनिश्चित किया गया है। तमिलनाडु, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने इस आंकड़े को पार करने के लिए कानून पारित किए हैं। तमिलनाडु में अभी ६९ प्रतिशत आरक्षण है। भारत की मौजूदा जनगणना डेटा १९५१ से २०११ तक है, जिसमें केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े दर्ज किए गए हैं। केंद्रीय कोटा व्यवस्था के अनुरूप ओबीसी के लिए २७ प्रतिशत सीटें अलग से रखी गई हैं।
बिहार की जातिगत जनगणना के आंकड़े भी एक तस्वीर पेश करते हैं, जो देश में आजादी के बाद शायद पहला ऐसा प्रयास है, जो हमें जातियों के सही आंकड़े दिखा रहा है। इन आंकड़ों के अनुसार, सवर्ण जातियां १५.५ प्रतिशत, पिछड़े २७ प्रतिशत, अति पिछड़े ३६ प्रतिशत, अनुसूचित जाति १९.६ प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति १.६८ प्रतिशत हैं। २७ प्रतिशत पिछड़ों में १४ प्रतिशत यादव हैं, ४.२५ प्रतिशत के करीब कुशवाहा हैं। अन्य जातियों में भूमिहार २.८६ प्रतिशत, ब्राह्मण ३.६६ प्रतिशत, कुर्मी २.८७ प्रतिशत, मुसहर ३.०० प्रतिशत, राजपूत ३.४५ प्रतिशत, वैश्य २.३१ प्रतिशत, रविदास ५.२ प्रतिशत, कोइरी ४.२ प्रतिशत, मल्लाह २.६ प्रतिशत, कायस्थ ०.६० प्रतिशत के करीब हैं।
इसके अलावा धर्म के आधार पर जो जनसंख्या निकलकर आई है, वह भी अनुमानों के अनुसार है। बिहार की कुल जनसंख्या १३.०७ करोड़ है, जिसमें हिंदू १०.७१ करोड़, मुसलमान २.३१ करोड़, ईसाई ७५,२३८, सिख १४,७५३, बौद्ध १,११,२०१ व जैन १२,५२३ हैं। यहां गौर करनेवाली बात यह है कि हिंदुओं की जनसंख्या २०११ की जनसंख्या के अनुसार, ८२.६९ प्रतिशत थी, जो १२ वर्षों में सिर्फ ०.७ कम होकर ८२ प्रतिशत रह गई। मुसलमानों की जनसंख्या १६.८६ प्रतिशत से बढ़कर १७.७० प्रतिशत हो गई, जो १२ वर्षों में ०.८० प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ है। इससे वो मिथक भी टूट गए हैं, जो समाज में भ्रामकता पैâला रहे थे। मुसलमानों की आबादी में १२ वर्षों में ०.८० प्रतिशत की वृद्धि एक बहुत ही मामूली वृद्धि है, जिसे हिंदू राष्ट्रवादी दलों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पैâलाया जा रहा है।
भगवा पार्टी भाजपा बार-बार कह रही है कि जाति जनगणना विभाजन की भावनाओं को भड़काएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सभी चुनावी रैलियों में इस बात का राग अलाप रहे हैं कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन जाति के आधार पर समाज को बांटना चाहती है। मोदी सरकार को अब इस बात का डर है कि उसका हिंदुत्व का एजेंडा अब उतना असरदार नहीं रहा है और लोग अब प्रतिदिन के जीवन की समस्याओं का निदान ढूंढ रहे हैं, जबकि भाजपा अभी भी उन्हें राष्ट्रवाद की चाशनी पिलाना चाहती है। भाजपा की ओबीसी की राजनीति भी जातिगत जनगणना से उसके हाथ से फिसल रही है। भाजपा की राजनीति में उच्च जाति और उच्च वर्ग के हिंदुओं की विशिष्टता की छवि को मात देने के लिए ओबीसी को एक कार्यकर्ता के रूप में शामिल किया गया है। नीतिश कुमार सरकार और विपक्षी इंडिया गुट का प्रयास बड़े पैमाने पर इस ओबीसी वोट बैंक को भाजपा की राजनीति से बाहर निकालने का है। एक बात तो अब पूर्ण रूप से स्पष्ट हो गई है कि २०२४ का चुनाव एक बार फिर से मंडल वर्सेस कमंडल होने जा रहा है। हमें इस रोचक लड़ाई के नतीजों का इंतजार करना होगा।
(स्तंभ लेखक आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक है)

 

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