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गुजर गया एक और साल

इश्क की मीठी बतियां और तकरार भी हुई ।
कभी आया पतझड़, कभी बहार भी हुई ।।
तेरी चाहत की छांव में जिंदगी गुजार दी ।
सौंपा खुद को मैंने अपनी खुशियां वार दी ।।
कहां से कहां पहुंच गए बात ही बात में ।
गुजर गया एक और साल तेरे साथ में ।।
खुशबू की तरह आयी थी तुम जिंदगानी में ।
हो खूबसूरत एक परी मेरी कहानी में ।।
साए की तरह साथ रही धूप-छांव में ।
बस गई हो अब मेरी चाहत के गांव में ।।
लगता नहीं है डर मुझे अब दिन और रात में ।
गुजर गया एक और साल तेरे साथ में ।।
इश्क के हसी सफर की रहगुजर हो तुम ।
मंजर ए खुशगवार हो, मेरी नजर हो तुम ।।
हूं दुआ-गो इस सफर में साथ तुम रहो ।
हूं तुम्हारी, बस तुम्हारी, दिन-रात तुम कहो ।।
कुछ भी नहीं रक्खा है शह और मात में ।
गुज़र गया एक और साल तेरे साथ में ।।
गुजर गया एक और साल तेरे साथ में ।।
-डॉ. वासिफ काजी
इंदौर, मप्र

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