मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : यूपी में गरमाई दलित राजनीति

उत्तर की बात : यूपी में गरमाई दलित राजनीति

रोहित माहेश्वरी
लखनऊ

लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बाकी हैं। ऐसे में हर मुद्दे पर राजनीति, राजनीतिक बयानबाजी और वार-पलटवार आम बात है। लेकिन इन दिनों यूपी में दलित राजनीति गरमाई हुई है। बीते दिनों पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर निगम बोर्ड बैठक के दौरान हुई मारपीट की घटना को लेकर राजनीतिक गलियारों में गहमागहमी तेज है। इस घटना पर कांग्रेस, बसपा, सपा, रालोद, आजाद समाज पार्टी सभी ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे दलित राजनीति से जोड़ने का काम किया।
पूर्व मुख्यमंत्री एवं बसपा प्रमुख मायावती ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। मायावती से पहले सपा प्रमुख अखिलेष यादव, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने इस घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया दी थी। तीनों जयंती चौधरी, अजय राय और चंद्रशेखर आजाद दलित पार्षदों के घर भी पहुंचे थे। दलित मुद्दे पर अन्य दलों को राजनीति करते देख थोड़ी देरी से ही मायावती का बयान सामने आया।
पश्चिम उत्तर प्रदेश को बसपा का गढ़ माना जाता है। मायावती दलित वोटरों को लेकर सचेत रहती हैं। दलित वोट बसपा को कोर वोट बैंक माना जाता है। २०१९ में जिन सीटों पर बसपा की जीत हुई थी उनमें चार सीटें सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा पश्चिम उत्तर प्रदेश से आती हैं। २०१४ के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता ही नहीं खुला था। वर्तमान में यूपी में बसपा का आधार गिरकर १३ फीसदी पर पहुंच गया है। पार्टी के पास महज एक विधायक है और २०१९ में जीते सांसदों का भी मोहभंग हो रहा है। इसके बाद भी मायावती न तो सड़क पर उतर रहीं और न भाजपा सरकार के खिलाफ उनके वो तेवर नजर आए, जिनके लिए वो जानी जाती हैं। पार्टी वैâडर और सूबे के आवाम के साथ उनका संवाद खत्म होता जा रहा है। ऐसे में सूबे के २२ फीसदी दलित मतदाताओं को अपनी-अपनी पार्टी में जोड़ने की कवायद हो रही है। पिछले दिनों मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया है।
बसपा ने अकेले अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने का एलान किया है। ऐसे में पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों को साधने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी के साथ हाथ मिला रखा है। आजाद समाज पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हैै, लेकिन दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए खासकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में सपा को आजाद समाज पार्टी की जरूरत है। युवाओं में चंद्रशेखर को लेकर क्रेज है। ऐसे में अखिलेश, जयंत और चंद्रशेखर तीनों मिलकर दलित वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिशों में लगे हैं। मायावती भी दलित वोटरों को लेकर काफी चौकन्नी रहती हैं। मेरठ की घटना के बाद से मायावती सक्रिय हो गई हैं और वो नहीं चाहती हैं कि उनके राजनीतिक विरोधियों को इस मामले में कोई माइलेज मिले।
मायावती के दलित कोर वोट बैंक पर भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद की नजर है। यूपी का २२ फीसदी दलित समाज दो हिस्सों में बंटा है। एक जाटव जिनकी आबादी करीब १२ फीसदी है और दूसरा १० फीसदी गैर-जाटव दलित हैं। मायावती जाटव समुदाय से आती हैं। चंद्रशेखर आजाद भी जाटव हैं और मायावती की तरह पश्चिम यूपी से आते हैं। जाटव वोट बसपा का हार्डकोर वोटर माना जाता है, जिसे चंद्रशेखर साधने में जुटे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सूबे की राजनीतिक बिसात पर मायावती अलग-थलग पड़ गई हैं, जिसके चलते दलित समुदाय के २२ फीसदी वोट बैंक पर विपक्षी दलों की निगाहें लगी हुई हैं। बीजेपी, सपा, आरएलडी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद तक दलित समुदाय का दिल जीतने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे में देखना है कि २०२४ के लोकसभा चुनाव में दलित समुदाय का कितना वोट किसे मिलता है? फिलहाल, मेरठ की घटना पर सूबे की राजनीति गरमाई हुई है। आने वाले दिनों में यह राजनीति और गरमाएगी।
(लेखक स्तंभकार, सामाजिक, राजनीतिक मामलों के जानकार एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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