मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : यूपी की राजनीति में जातिगत जनगणना का फैक्टर

उत्तर की बात : यूपी की राजनीति में जातिगत जनगणना का फैक्टर

राजेश माहेश्वरी लखनऊ

महात्मा गांधी जयंती के दिन बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना सर्वेक्षण के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद से देश की राजनीति में भूचाल सा मचा हुआ। इन आंकड़ों के जारी किए जाने के बाद यूपी में भी इस मुद्दे पर सियासत शुरू हो गई है। विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष में शामिल बीजेपी के सहयोगी दल भी जाति आधारित जनगणना की मांग को फिर से उठाने लगे हैं। एनडीए की घटक दल अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी जाति आधारित जनगणना करने की मांग उठाकर बीजेपी पर दबाव बना दिया है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा पर निशान साधा है। अखिलेश यादव ने देशव्यापी जातीय जनगणना की अपनी मांग को और तेज कर दिया है। गौरतलब है कि सपा प्रमुख पिछले काफी समय से प्रदेश और देश में जातीय जनगणना कराने की मांग उठाते रहे हैं। बिहार के आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद सपा अध्यक्ष ने कहा कि जातीय जनगणना देश की प्रगति का मार्ग है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) देश में राजनीति की भविष्य की दिशा तय करेंगे। सपा प्रमुख ने कहा कि, जाति आधारित जनगणना ८५ प्रतिशत बनाम १५ प्रतिशत के संघर्ष का नहीं बल्कि सहयोग का नया रास्ता खोलेगी, जो लोग सब के हक के हिमायती हैं वे इसका समर्थन भी करते हैं, जो सच में अधिकार दिलवाना चाहते हैं, वह जाति आधारित जनगणना करवाना चाहते हैं।
भाजपानीत एनडीए में सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी अखिलेश यादव के सुर में सुर मिलाया है। सुभासपा के महासचिव अरुण राजभर ने भी जातीय जनगणना को सही करार दिया है। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी हमेशा राष्ट्रव्यापी जातीय जनगणना की समर्थक रही है। इसके बिना वंचित, गरीब और उत्पीड़ित वर्गों का सामाजिक सशक्तिकरण संभव नहीं है। अपना दल (एस) की मुखिया अनुप्रिया पटेल का कहना है कि उनकी पार्टी हमेशा से जाति आधारित गणना करने की पक्षधर रही है और इस मुद्दे को उन्होंने सड़क से लेकर संसद तक उठाया है। वहीं सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी के मुख्य प्रवक्ता अरुण राजभर का कहना है कि उनकी पार्टी का गठन ही इस मुद्दे की लड़ाई को लेकर हुआ है। पार्टी विधानसभा में इस मुद्दे को कई बार उठा चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी इसकी लड़ाई सत्ता के भीतर और बाहर रहकर भी लड़ती रही है। सुभासपा रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की भी मांग भी कर चुकी है।
यूपी सरकार में शामिल निषाद पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश के वैâबिनेट मंत्री डॉ. संजय कुमार निषाद का कहना है कि नीतीश सरकार जाति आधारित सर्वे के नाम पर जातियों को भरमाना चाहती है। इनके वोट को बांटकर ओबीसी और एससी-एसटी की संख्या को छोटा करना चाहती है। हम चाहते हैं कि संवैधानिक रूप से गिनती होनी चाहिए। यदि जाति आधारित जनगणना करनी है तो वर्ष १९६१ के गणना के आधार पर जाति आधारित गणना होनी चाहिए।
यूपी विधानसभा चुनाव २०२२ के दौरान समाजवादी पार्टी गठबंधन ने सरकार बनने की स्थिति में जातीय जनगणना कराने की घोषणा की थी। इसे अपने चुनावी एजेंडे में शामिल किया था। सरकार बनने की स्थिति में तीन माह के भीतर जातीय जनगणना का वादा किया गया था। फरवरी में बजट सत्र के दौरान भी समाजवादी पार्टी ने यूपी में जातीय जनगणना का मुद्दा विधानसभा के पटल पर उठाया। जातीय जनगणना को लेकर बसपा प्रमुख मायावती का भी बयान आया है। उनका कहना है कि बसपा जातीय जनगणना की प्रबल समर्थक है। इसके लिए केंद्र सरकार को आगे आना चाहिए।
अभी हाल ही में घोसी उपचुनाव के समय भी अखिलेश ने पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण की वकालत की थी और उसका नतीजा भी जीत के तौर पर उसे मिला। जातिगत जनगणना के आंकड़ों के बाद यूपी में पीडीए की राजनीति भी पहले से और तेज होगी। यूपी से ८० सांसद चुनकर संसद में पहुंचते हैं। ऐसे में विपक्षी दल इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने में कोई मौका नहीं चूकेंगे। भारत की २६ प्रमुख विपक्षी पार्टियों के इंडिया गठबंधन ने बीती १८ जुलाई को बेंगलुरु में बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया था। इसमें विपक्षी दलों ने देश में जातिगत जनगणना कराने की मांग की थी। आनेवाले महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और साल २०२४ में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह बात साफ है कि जातिगत जनगणना के मुद्दे की गूंज देश की राजनीति में सुनाई देगी।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)

अन्य समाचार