मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : मायावती की घोषणा से त्रिकोणीय मुकाबले के आसार!

उत्तर की बात : मायावती की घोषणा से त्रिकोणीय मुकाबले के आसार!

रोहित माहेश्वरी लखनऊ

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने बीती १५ जनवरी को अपने जन्मदिन पर मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि वे अकेले चुनाव लड़ेंगी और कोई तालमेल नहीं करेंगी। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं था, जब मायावती ने ये बयान दिया हो। इससे पहले भी कई मौकों पर वो ये बयान देकर अपनी पार्टी का स्टैंड साफ करती रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच ऐसा होगा? इंडिया गठबंधन के गठन के बाद से ही बसपा को इसमें शामिल करने की कोशिशें की जा रही थीं। खासकर कांग्रेस यह चाहती है कि मायावती गठबंधन का हिस्सा बनें, लेकिन किसी न किसी वजह से मायावती गठबंधन से दूर ही रहीं। इंडिया गठबंधन की तरह मायावती ने एनडीए से भी बराबर की दूरी बना रखी है।
पांच राज्यों के चुनाव के बाद इस बात की ज्यादा उम्मीद थी कि मायावती गठबंधन का हिस्सा बन जाएंगी। हालांकि, पांच राज्यों के नतीजे बसपा और कांग्रेस दोनों की उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। राज्यों के चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की दिल्ली में बैठक हो चुकी है। पिछले दिनों वर्चुअल बैठक भी हुई। इन दिनों इंडिया गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर बैठकों का दौर जारी है। ऐसे में अपने जन्मदिन पर मायावती ने गठबंधन से दूर रहने को एलान कर विपक्ष की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम किया है।
गौरतलब है कि मायावती काफी समय से कह रही हैं कि वे अकेले लड़ेंगी, क्योंकि गठबंधन का फायदा कम और नुकसान ज्यादा होता है। हालांकि, उनकी यह बात तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, फिर भी उनके अकेले लड़ने की घोषणा से बसपा के सांसद दूसरी पार्टियों में अपनी जगह देखने लगे हैं। उनको पता है कि अकेले लड़ने पर फिर बसपा का कोई उम्मीदवार नहीं जीतेगा।
२०१४ का आम चुनाव बसपा ने अपने दम पर लड़ा था। तब वह बड़ी पार्टी थी और उत्तर प्रदेश की सत्ता से हटे उसे सिर्फ दो साल हुए थे। २०१४ के लोकसभा चुनाव से पहले २०१२ में हुए विधानसभा चुनाव में उनको २६ फीसदी वोट और ८० सीटें मिली थीं, इसलिए २०१४ का चुनाव उन्होंने पूरी ताकत से लड़ा था। उनकी पार्टी को २० फीसदी वोट मिले, लेकिन उसका खाता नहीं खुल पाया।
मायावती के इस पैâसले का असर २०२४ के चुनाव में जरूर होगा, क्योंकि बसपा सीटों के मामले में भले ही मजबूत न हो लेकिन वोट बैंक के मामले में वो काफी मज़बूत हैं। बसपा का एक वोट बैंक है, जो हमेशा साथ दिखाई देता है। आंकड़ों के मुताबिक, साल २०१४ के लोकसभा में भले ही बसपा को एक भी सीट न मिली हो, लेकिन पार्टी को १९.७७ फीसदी वोट मिला, जबकि २०१७ विधानसभा चुनाव में बसपा को १९ सीटों पर जीत मिली और वोट २२.२३ फीसदी रहा। इसके बाद २०१९ के लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा के साथ चुनाव लड़ा और १० सीटें मिली और सिर्फ ३८ सीटों पर चुनाव लड़कर १९.२६ फीसदी वोट पाया, जबकि २०२२ विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ १ सीट मिली और वोट १२.८८ फीसदी रहा।
इन आंकड़ों से साफ है कि मायावती भले ही सीटें जीतें या न जीतें, लेकिन उनके पास इतना वोट है कि वो लोकसभा चुनाव की तस्वीर बदल सकती हैं। अब जब मायावती अकेले चुनाव में जा रही हैं तो फिर इसका सीधा असर यूपी की राजनीति पर पड़ेगा। मायावती के अलग होने से विपक्ष की लड़ाई कमजोर हो जाएगी और यूपी की लड़ाई त्रिकोणीय हो जाएगी। इससे भाजपा का राह आसान हो जाएगी। भाजपा भी यही चाहती है कि यूपी में गठबंधन न हो पाए।
मायावती अगर अकेले चुनाव में उतरने वाली हैं तो उनकी रणनीति साफ है कि भले ही उनकी पार्टी कोई सीट न जीत पाए, लेकिन वो सपा का खेल जरूर खराब कर सकती हैं। दरअसल, पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक कई सीटों पर मायावती का प्रभाव है और अगर मायावती इन सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतार देती हैं तो सपा का वोट कम हो जाएगा, जैसे आजमगढ़ उपचुनाव में हुआ था, जब बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी की वजह से सपा को हार का सामना करना पड़ा था। अगर मुस्लिम वोट बैंक बंटता है तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। वैसे राजनीति के जानकार बताते हैं कि इंडिया गठबंधन ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दक्षिण भारत के एक दलित नेता को अध्यक्ष बनाकर एक चेहरा पेश कर दिया है। यही वजह है कि मायावती नाराज हो गई हैं। खड़गे को नेता बनाने के बाद मायावती का चेहरा पेश किए जाने की संभावना नहीं है। फिर भी अगर वे गठबंधन में शामिल होती हैं तो उनके साथ-साथ विपक्ष को भी फायदा होगा। खबर यह भी है कि चुनाव से पहले मायावती कोई बड़ा पैâसला लेकर सबको चौंका सकती हैं।
(लेखक स्तंभकार, सामाजिक, राजनीतिक मामलों के जानकार एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)

अन्य समाचार