मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : घोसी उपचुनाव जीतकर विपक्ष ने जताए अपने इरादे

उत्तर की बात : घोसी उपचुनाव जीतकर विपक्ष ने जताए अपने इरादे

राजेश माहेश्वरी
लखनऊ

देश की संसद को सर्वाधिक सांसदों का योगदान देने वाले उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए घोसी उपचुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। बीजेपी प्रत्याशी को इंडिया गठबंधन के अहम दल समाजवादी पार्टी प्रत्याशी सुधाकर सिंह ने सपा से बीजेपी में आए दारा सिंह चौहान को ४२ हजार से अधिक वोटों के अंतर से परास्त किया। चुनाव नतीजे इस तरह के आएंगे ऐसी उम्मीद चुनावी जानकार नहीं कर रहे थे। इतनी बड़ी वोटों की यह हार बताती है कि दारा सिंह और भाजपा को क्षेत्र की जनता ने करीब-करीब खारिज कर दिया है। यह चुनाव बीजेपी की नाक का सवाल था। चुनाव से ठीक पहले उन्होंने गठबंधन के पेचों को कसते हुए सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर की एनडीए में वापसी कराई थी। लेकिन बीजेपी की रणनीति यहां नाकाम रही और उसके प्रत्याशी विधानसभा नहीं पहुंच सका।
ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या घोसी की तरह प्रदेशभर में सत्तारूढ़ दल के प्रति विरोध की लहर है? सवाल यह भी है कि क्या जब वोटों की गुणा गणित के चलते ही बीजेपी द्वारा समाजवादी पार्टी से तोड़कर दारा सिंह चौहान और ओमप्रकाश राजभर को लाया गया फिर भी पार्टी कैंडिडेट की इतनी बड़ी हार क्यों हुई? सवाल यह भी है कि क्या इंडिया गठबंधन की ओर प्रदेश की जनता का रूझान बढ़ा है? सवाल तो कई हैं, लेकिन फिलवक्त इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। बीजेपी की केंद्रीय और प्रदेश इकाई ने इन चुनावों को कितनी गंभीरता से लिया था, इससे स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव प्रचार में न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गए और न ही अमित शाह। इतना ही नहीं चुनाव प्रभार जूनियर नेताओं के हवाले था। इसका अर्थ साफ है कि यूपी में बीजेपी दो धड़ों में बंटी है। जिन नेताओं को यूपी इकाई की सहमति के बिना केंद्रीय नेतृत्व पार्टी में शामिल कर रहा है, उन्हें लेकर स्थानीय इकाई में नाराजगी है। एक तरफ अखिलेश और शिवपाल कंधे से कंधा मिलाकर चुनाव प्रचार कर रहे थे तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अंतिम चरण में रैली करने पहुंचे। अगर ऐसा है तो लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी का पासा उलटा ही पड़ेगा।
घोसी उपचुनाव में हार को लेकर ये बात भी कही जा रही है कि दारा सिंह चौहान और ओमप्रकाश राजभर को योगी आदित्यनाथ पार्टी में लाने से खुश नहीं थे। यही कारण रहा कि उन्होंने इन लोगों को अभी यूपी सरकार में मंत्री पद से दूर रखा है। जबकि यह बात किसी से छुपी नहीं है कि इन दोनों नेताओं की वापसी इसी शर्त पर हुई दोनों को मंत्री पद दिया जाएगा। भाजपा को घोसी उप-चुनाव में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल और निषाद पार्टी से करिश्मे की उम्मीद थी। घोसी में करीब ५५ हजार राजभर, १९ हजार निषाद और १४ हजार कुर्मी मतदाता हैं। भाजपा ने सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद की सभाएं, रैलियां और बैठकें करार्इं। लेकिन चुनाव के नतीजे के आंकड़े बता रहे हैं कि राजभर और निषाद मतदाताओं ने स्थानीय प्रत्याशी को वोट दिया। ये चुनाव इस बात को भी परखने के लिए था कि संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर की अपनी जातियों में कितनी पैठ है। चुनाव नतीजे यह बताते हैं कि जाति के नाम पर राजनीति करने वाले इन दलों के साथ मतदाता आंख मूंदकर नहीं चल रहा है। घोसी उपचुनाव एक तरह से पक्ष और विपक्ष की सीधी टक्कर का चुनाव था। हालांकि, इस चुनाव में बसपा ने इस बार अनूठा प्रयोग किया था। कहा था कि यह चुनाव थोपा गया चुनाव है। ऐसे में बसपाई या तो इस चुनाव से दूर रहें या नोटा दबाएं। बसपा ने यह फरमान पूरे भरोसे के साथ जारी किया था क्योंकि घोसी में बसपा समर्थकों की बड़ी संख्या है। चुनाव के परिणाम बता रहे हैं कि बड़ी संख्या में दलित साइकिल पर सवार हो गए। कोई भी अपील इन वोटरों पर बेअसर साबित हुई। इंडिया गठबंधन की प्रमुख घटक समाजवादी पार्टी इसे इंडिया की ताकत और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की सफल रणनीति के तौर पर पेश कर सकती है। बसपा प्रमुख ने अपने वोटरों को चुनाव से दूर रहने या नोटा दबाने को कहा था। बावजूद इसके सपा के खाते में गए दलित वोट मायावती की मुश्किल बढ़ा सकते हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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