मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात: विधानसभा चुनाव नतीजों से बसपा और सपा को झटका!

उत्तर की बात: विधानसभा चुनाव नतीजों से बसपा और सपा को झटका!

राजेश माहेश्वरी लखनऊ

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। हिंदी बेल्ट के तीन राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे चर्चाओं में है। इन नतीजों का असर यूपी की राजनीति और राजनीतिक दलों खासकर सपा और बसपा की राजनीति पर पड़ना तय है। वास्तव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को इन चुनाव नतीजों से निराशा ही हाथ लगी है।

विधानसभा चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश से बाहर भी हाथी की रफ्तार बेहद सुस्त हो गई है। २०१८ के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार बसपा की सीटें और वोट प्रतिशत दोनों कम हुए हैं। राजस्थान को छोड़कर बसपा कहीं खाता नहीं खोल सकी। राजस्थान में उसे दो सीटों पर जीत मिली है। वहीं मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन भी बेहद निराशाजनक रहा।

रणनीति के तहत बसपा प्रमुख इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं हुर्इं। अंदरखाने कांग्रेस से उनकी बातचीत जारी रही। मीडिया में रोज-रोज आती खबरों को विराम देने के लिए मायावती ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का एलान कर दिया। असल में बसपा लोकसभा चुनाव से पूर्व राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक कद और हैसियत बढ़ाना चाहती थी। पार्टी की मंशा यह थी कि इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन से उसे लोकसभा चुनाव में तो लाभ मिलेगा। साथ ही भविष्य में गठबंधन बनता है तो वो उसमें बेहतर तरीके से अपने हिसाब से जोड़-तोड़ और मोलभाव कर सकेंगी लेकिन नतीजों ने बसपा का सपना चकनाचूर करने का काम किया। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बसपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा। राजस्थान और तेलंगाना में सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारे, लेकिन हाथी यहां अपनी छाप नहीं छोड़ पाया।

बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर बनाने के बाद पहली बार चुनावों में इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी थी। मायावती ने भी सभी राज्यों में रैलियां कीं। रणनीति यह थी कि अगर विधानसभा चुनाव में पार्टी कोई करिश्मा करती तो इसका श्रेय आकाश को ही दिया जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अब आकाश की आगे की राह मुश्किल ही रहेगी।

बात अगर यूपी के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की की जाए तो मध्य प्रदेश में इंडिया गठबंधन में सीटों को लेकर अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच काफी तू-तू, मैं-मैं हुई थी। अखिलेश ने साफतौर पर आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने गठबंधन को लेकर उनसे बातचीत की थी। सात सीटें उन्हें देने की बात हो रही थी, लेकिन बाद में कांग्रेस मुकर गई। इसके बाद यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को अखिलेश द्वारा चिरकुट कहने, अखिलेश-वखिलेश जैसे बयानों से दोनों पार्टियों के बीच माहौल बिगड़ा था। गठबंधन में सीटें न मिलने से कांग्रेस से नाराज सपा ने अकेले दम पर पूरी ताकत झोंकी थी। हालांकि, सपा वहां कोई असर नहीं छोड़ पाई। पार्टी को महज ०.४५ प्रतिशत वोट ही मिले। वोट प्रतिशत के लिहाज से यह सपा का अपनी स्थापना के बाद सबसे खराब प्रदर्शन है। मध्य प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी ने करीब ५० उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने वहां करीब १० दिनों तक चुनाव प्रचार किया था। पार्टी के कई सीनियर नेता भी चुनाव प्रचार में जुटे थे। अखिलेश ने यहां पीडीए फॉमूले को लागू करते हुए जातीय जनगणना को चुनावी मुद्दा बनाया था। पार्टी को सबसे अधिक उम्मीद बुंदेलखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में थी, लेकिन उसे हर ओर निराशा हाथ लगी। वहीं सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच वाद-विवाद से दोनों दलों के रिश्तों में भी खटास आई है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, वर्तमान में सपा और कांग्रेस दोनों एक ही धरातल पर खड़े दिखाई देते हैं। दोनों को ही चुनाव नतीजों से निराशा हाथ लगी है। सपा और कांग्रेस के रिश्तों की कड़वाहट को कम करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। बसपा भी निराशाजनक प्रदर्र्शन के बाद ज्यादा मोलभाव की हालत में दिखाई नहीं देती है। वहीं जयंत चौधरी की रालोद भी राजस्थान में एक ही सीट जीत पाई है। राजस्थान में सीटों के बंटवारे को लेकर रालोद की भी कांग्रेस से खींचतान हुई थी। ऐसे में आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति का पहिया तेजी से घूमना तय है। अब यह देखना अहम होगा कि इंडिया गठबंधन पहले से ज्यादा समझदारी दिखाकर मजबूत होगा या फिर वो कोई नया रूप या आकार लेगा।

(लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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