जीने की कला

एक दिन घर में बैठे बैठे
जीने की कला का अर्थ
सोचने लगा।
तभी घर का सबसे छोटा बालक
सम्भलते सम्भलते दौड़ कर आ
मेरी गोद में बैठ गया,
वो मुस्कुराकर मेरी ओर निहारने लगा
उसकी मुस्कुराहट देख मुझे लगा
मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया।
शायद वो कह रहा था,
सकारात्मकता और मुस्कुराहट जीवन एक ऐसी सपाट राह है,
जिसमें कहीं कहीं उदासी,
हताशा, हीनता और कंगाली जैसे
गति अवरोध आते रहते हैं।
आपको एक राहगीर की भांति
इसे पार करना होगा।

पूरन ठाकुर ‘जबलपुरी’
कल्याण

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