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अतीत का धुआं वर्तमान के रोशनदान से कितना ही छनकर बाहर क्यों न निकल जाए, उसका विषैलापन अदृश्य सा कहीं न कहीं मन के किसी कोने में परत-दर-परत उपस्थित रहता है।
तब उत्कृष्ट से उत्कृष्ट चेतना भी आकृष्ट
होकर धुंधलेपन का शिकार हो जाती है……
असहजता का अनुभव उस अवस्था में भय को भी भयभीत करने लगता है। तब वो शख्स कुछ अज्ञात आकृतियों को टटोलते हुए मौन अपने पग धरते उनके पीछे रुख करता है…..अशेष संभावनाओं का धागा अपनी उंगलियों पर लपेटे।
किन्तु अतीत की खिड़कियों पर लगे जालों को हटाने के लिए संभावनाओं के ये धागे पर्याप्त नहीं होते …..
ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ों पर चढ़ाव के
लिए पहाड़ों के नीचे वनस्थलों में भटकते बटोही की इच्छाएं पर्याप्त नहीं होतीं …..
उसे अपने हौसलोेंं की लाठी, व तरकीबों की दुनिया अपने दिमाग की छोटी सी पोटली में सहेजनी ही पड़ती है….
उम्मीद की किरणें इतनी तेज होती हैं कि धुएं में भटकता हुआ शख्स भी ….धुएं के उस पार….बहुत दूर तक एक लम्बे अंतराल के पश्चात पहुंचने में सफल हो जाता है….वहां, जहां होता है एक खुला आसमान, बाहें पैâलाए सुकून भरी मिट्टी, हमारे सपनों का घराना…
व्यक्ति छोटी से छोटी असफलता से
अवसादग्रस्त हो जाता है ….सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाएं उन्हें विचलित कर जाती हैं, वो स्वयं को निर्बलता का आकार देने
लगते हैं ….ऐसी अवस्था में यकीनन आपकी असहजता आपकी असफलता का कारण बनती है। किंतु जिनके मस्तिष्क में उम्मीद का भंडार होता है…वे अपनी सकारात्मकता से असफलता के अंतिम पड़ाव तक पहुंचने के पश्चात भी अपनी जीत का परचम लहराते हैं।
उम्मीद महज एक सफलता का साधन नहीं होता, बल्कि वो आपके जीवन का आधार है….उम्मीद वो भंडार है जो
अपनी ऊर्जा से आपको पृथ्वी से आसमान की उड़ान कराने में सक्षम होता है।
– अहाना अर्चना पांडेय (लेखक, ब्लॉगर)
मोदीनगर, गाजियाबाद

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