मुख्यपृष्ठसमाचारपाबंदियां हटते ही वैष्णो देवी के दर्शनार्थ उमड़ी भीड़

पाबंदियां हटते ही वैष्णो देवी के दर्शनार्थ उमड़ी भीड़

सुरेश एस डुग्गर। कोरोना के दो सालों की पाबंदियों के हटते ही वैष्णो देवी के तीर्थस्थान पर उमड़ी भीड़ स्थानीय व्यापारियों को खुशी के पल तो दे रही है पर वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के अधिकारी अभी भी चिंतित हैं। उनकी चिंता के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यात्रा में शामिल होनेवाले श्रद्धालुओं द्वारा फिलहाल कोई रिकॉर्ड कायम नहीं कर पाने की है। दूसरी चिंता इस साल के पहले दिन की घटना की पुनर्रावृत्ति के डर की है जब १२ श्रद्धालु पहली बार हुई भगदड़ में दब कर जान गवां बैठे थे।

हालांकि दो साल के बाद उन्मुक्त होकर वैष्णो देवी की यात्रा में शिरकत कर रहे हजारों श्रद्धालुओं के मन में उल्लास है, खुशी है। इस खुशी को पुख्ता करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती भी की गई है ताकि आतंकी या अन्य तत्व मौके का फायदा न उठा सकें। ऐसा उन रपटों के बाद किया गया है, जिनमें कहा जा रहा है कि आतंकी कुछ बड़ा कर सकते हैं।

यह सच है कि चैत्र नवरात्रि के पहले दिन कटड़ा के बेस कैंप में तिल धरने की जगह नहीं है। पर एक होटल व्यवसायी धरुण शर्मा अधिक खुश नजर नहीं आते थे। कारण स्पष्ट था। वे कहते थे कि कटड़ा में रेल आने और अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन बन जाने के कारण छोटे होटलों और सरायों का धंधा खात्मे के कगार पर है क्योंकि सुबह जल्दी कटड़ा पहुंच कर शाम को वापसी की चाहत लेकर आने वाले श्रद्धालु अधिक जेब ढीली नहीं करते थे।

दरअसल श्राइन बोर्ड भी अनावश्यक भीड़ एकत्र नहीं होने देना चाहता। इसके लिए भीड़ नियंत्रण की खातिर विशेषज्ञों की सहायता ली जा रही है। पहली जनवरी के हादसे के बाद तो पांच सालों से बंद उस पर्ची सिस्टम को भी फिर से चालू किया जा चुका है जो ग्रुप संख्या के आधार पर श्रद्धालुओं को आगे बढ़ने की अनुमति देता था। इसकी खातिर कई स्थानों पर बैरिकेड भी बनाए गए हैं जहां ग्रुप संख्या के मुताबिक ही श्रद्धालुओं को आगे छोड़ा जा रहा था।

हालांकि श्राइन बोर्ड के अधिकारी चाहते हैं कि इस साल आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक नया रिकॉर्ड बनाए। वर्ष २०१२ में पहली बार श्रद्धालुओं की संख्या ने एक करोड़ का आंकड़ा पार किया था, उसके बाद यह लगातार चार सालों तक ढलान पर रही। फिर दो साल इसमें बढ़ोतरी तो हुई पर कोरोना के दो सालों ने इसकी बाट लगा दी। कोरोना काल में तो यह हाल था कि वर्ष २०२० में अप्रैल से जुलाई तक यात्रा के बंद रहने के कारण साल में मात्र १७ लाख श्रद्धालु ही आए थे।

इतना जरूर है कि पिछले महीने के आंकड़ों ने श्राइन बोर्ड के साथ ही कटड़ा के व्यापारियों को खुशी दी है। पिछले महीने ७७.८६ लाख श्रद्धालु आए हैं। इस साल के पहले तीन महीनों में आने वाले १५.७८ लाख श्रद्धालुओं ने पिछले साल का अपना रिकार्ड तोड़ दिया है। पिछले साल के पहले तीन महीनों के अनुपात में इस साल २.५५ लाख श्रद्धालु अधिक तो आए हैं पर श्राइन बोर्ड की रिकॉर्ड की उम्मीद को पूरा करने के लिए उसे प्रतिदिन ३६००० श्रद्धालुओं की जरूरत है ताकि इस साल आने वालों की संख्या एक करोड़ के आंकड़े को पार कर सके।

यह पूरी तरह से सच है कि चाहे कश्मीर की ओर बढ़ते पर्यटकों के कदमों को आतंकियों की गोलियों की सनसनाहट ने अक्सर रोका हो लेकिन बमों के धमाके भी वैष्णो देवी के श्रद्धालुओं को कभी नहीं रोक पाए। हालांकि पहले नवरात्रि के दौरान अधिक भीड़ होती थी तो अब गर्मियों में उत्तरी भारत तथा सर्दियों में महाराष्ट्र तथा गुजरात से आने वाले श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय व्यापारियों को श्रद्धालुओं की कमी नहीं खलती है।

पहले सर्दियों में आने वालों की संख्या बहुत ही कम होती थी। भयानक सर्दी तथा अव्यवस्थाओं के चलते लोग सर्दियों के स्थान पर साल के अन्य महीनों में भी गुफा के दर्शनार्थ आते थे। लेकिन पिछले करीब १६ सालों से स्थापना बोर्ड द्वारा बिना शुल्क हीटर, अधिक संख्या में कम्बलों तथा गर्मी पहुंचाने के साधनों का इंतजाम बड़ी मात्रा में किए जाने के कारण सर्दियों में भी बड़ी भीड़ श्रद्धालुओं की आ रही है।

यह बात अलग है कि सर्दियों में वैष्णो देवी की तीर्थयात्रा पर आने का अपना अलग ही आनंद है। यह आनंद तब और भी बढ़ जाता है जब गुफा के आसपास के क्षेत्र में या तो बर्फबारी हो रही हो या फिर बर्फबारी हो चुकी हो। ऐसे में श्रद्धालु एक पंथ में दो काज संवार लेते हैं। उन्हें कश्मीर या फिर पत्नीटाप नहीं जाना पड़ता बर्फ देखने की खातिर।

चाहे कुछ भी कहा जाए वर्ष १९५० में जिस गुफा के दर्शनार्थ मात्र ३००० लोग आया करते थे, उसका कायाकल्प करने में पूर्व राज्यपाल जगमोहन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जिन्होंने १९८६ में इसका संचालन अपने हाथों मे लेकर स्थापना बोर्ड की स्थापना की थी।

यही कारण है कि ७२ साल के दौरान गुफा के दर्शनार्थ आने वालों की संख्या सैंकड़ों गुण बढ़ी है तो वे लोग आज भी जगमोहन का अहसान मानते हैं, जो लगातार पिछले कई सालों से पवित्र गुफा के दर्शनार्थ आ रहे हैं क्योंकि अब उनके लिए गुफा के दर्शन सुविधाजनक हो गए हैं।

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