मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ: एशिया का पहला ठंडा-ठंडा कूल-कूल थिएटर!

संडे स्तंभ: एशिया का पहला ठंडा-ठंडा कूल-कूल थिएटर!

विमल मिश्र।  कोलाबा का रीगल हिंदुस्थान ही नहीं, एशिया भर में पहला वातानुकूलित और एलिवेटर युक्त अंडरग्राउंड कार पार्किंग वाला सिनेमाघर है। इसकी खूबसूरती उतनी ही बेमिसाल है, जितने यहां होनेवाली ‘फिल्मफेयर अवॉर्ड’ नाइट्स।

१९३३ के जमाने में हिंदुस्थान में चंद लोगों को छोड़कर बाकी ने एसी नाम की चिड़िया के बारे में सुना भी नहीं था और मुंबई के इक्का-दुक्का कार्यालयों या खास लोगों के घरों में ही यह सु‌विधा होती थी। कोलाबा का रीगल सिनेमा अपने यहां आम लोगों के लिए एयर कंडीशनर ले आया। एक ही कीमत में दो मजे…दर्शकों के तो पौ-बारह हो गए। थिएटर के बाहर लाइनें लगने लगीं और बॉक्स ऑफिस पर पैसों की खनक जो शुरू हुई, फिर बरसों बंद नहीं हुई।
रीगल कोई मामूली थिएटर नहीं था। वातानुकूलित सिनेमाघर था। हिंदुस्थान ही नहीं, एशिया भर में पहला। रीगल को चार चांद लगाती थी उसकी एलिवेटर युक्त अंडरग्राउंड कार पार्किंग, जो इससे पहले देश की किसी अन्य सिनेमाघर में नहीं थी। ७० एमएम वाइड ऐंगिल स्क्रीन और डॉल्बी साउंड सिस्टम के साथ यहां फिल्म देखना अपने आप में एक अनुभव था।
हॉलीवुड से परिचित कराने वाले मुंबई के पहले सिनेमाघरों में है रीगल। ‘बेन हर’, ‘टेन कमांडमेंट’, ‘लारेंस ऑफ अरेबिया’, ‘क्लियोपेट्रा’ व ‘साउंड ऑफ म्यूजिक’ से लेकर ‘रोमन हॉलिडे’, ‘एंटर दि ड्रैगन’, ‘गांधी’ और ‘टा‌इटनिक’ तक-कॉमेडी, वेस्टर्न, वॉर, क्राइम, थ्रिलर, सस्पेंस, हॉरर, म्यूजिकल और पीरियड, जो भी फिल्म एक बार यहां लगती तो टिक जाती। जेम्स बांड सीरीज की फिल्में तो २० हफ्ते जरूर चलतीं। ’७० और ’८० के दशक में गोल्डन जुबली और ब्लैक मार्वेâटिंग के नजारे यहां आम बात थे।
‘स्वेज के पूरब का सर्वश्रेष्ठ सिनेमाघर’
मुंबई का कोई सिने इतिहास रीगल सिनेमा से जुड़े किस्सों के बिना पूरा नहीं होगा। कोलाबा कॉजवे की शहीद भगत सिंह रोड पर जहांगीर आर्ट गैलरी और छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय के दो छोरों के बीच स्थित जिस जगह का रीगल को बनाने के लिए चुनाव हुआ, वहां कभी नौसेना की सैल्यूटिंग बैटरी थी। पूर्ण रूप से आरसीसी से बने १,१६० सीट वाले दोमंजिला रीगल का जब निर्माण हुआ तब वैâखुशरू कूका के साथ इसके निर्माता फरामजी सिधवा की गर्वोक्ति थी कि यह ‘स्वेज के पूरब का सर्वश्रेष्ठ सिनेमाघर’ है। फरामजी सिधवा मुंबई आए थे रंगून से, जहां प्रॉजेक्ट ऑपरेटर के रूप में वे एक घुड़साल को सिनेमाघर में तब्दील कर चुके थे। ४ अक्टूबर, १९३३ में यहां प्रदर्शित पहली फिल्म कॉमेडी के सर्वकालीन सुपरस्टार माने जानेवाले लॉरेल और हार्डी की ‘दि डेविल्स ब्रदर’ थी। आज तक रीगल ने इस अवसर पर लॉरेल और हार्डी का टेलिग्राम से भेजा गया शुभकामना संदेश संभालकर रखा है।
मुंबई जब नवनिर्माण के शुरुआती दौर में था, रीगल सिनेमा शहर में उभरती नई वास्तुकला ‘आर्ट डेको’ का प्रतिनिधि बन गया। विक्टोरिया टर्मिनस (छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) और मनपा की इमारत बनानेवाले विख्यात ब्रिटिश आर्किटेक्ट एफ. डब्ल्यू, स्टीवेंस के बेटे चार्ल्स स्टीवेंस और चेक आर्टिस्ट कार्ल सचारा द्वारा डिजाइन रीगल की खूबसूरती हैं उसके एंटीरियर, गुंबद व सीढ़ियां, फिटिंग्स और विस्तृत मिरर वर्क। शिखर पर पीत नारंगी और हरे रंग की आभा में सूर्य किरणों के रूप में मुख्य ऑडिटोरियम का रूपांकन आपको गर्मजोशी से भर देता है। पहली मंजिल पर ऑडिटोरियम के बाहर संकरे से गलियारे में दीवारों पर लिज टेलर, मार्लन ब्रांडो, ग्रेटा गार्बो, वैâरी ग्रांट, चार्लटन हेस्टन, मर्लिन मुनरो, ऑड्री हेपबर्न और प्रâेंक सिनात्रा, जेरी लेविस सरीखे कलाकारों के हॉलीवुड के आकर्षक स्टूडियो पोर्टेट टंगे हुए थे। ऊंचे मिरर पैनल पर ‘अंकल ऑस्कर’ की इंबॉसिंग थी-एकेडमी अवार्ड्स में प्रस्तुत की जानेवाली ट्रॉफियां। इमारत में आज जहां एचडीएफसी बैंक की शाखा है, वहां पहले एक वैâफे हुआ करता था। रीगल पहले केवल सिनेमा के लिए ही था। बाद में इसके निचले हिस्से में दुकानें भी बन गईं। फरामजी के निधन के बाद उनके बेटे धुनजी ने इसका वैभव और बढ़ाया। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से साउंड और मोशन पिक्चर इंजीनियरिंग में डिग्री लेकर आए धुनजी ने इसे ७०एमएम और डॉल्बी साउंड सिस्टम से लैस किया। मौजूदा मालिक फरामजी की पौत्री कमल सिधवा तारापोरवाला ने भी भरसक योगदान दिया।
फिल्मफेयर अवॉर्ड्स का पहला ठिकाना
रीगल में बहुत सारे फिल्म फेस्टिवल, लघु फिल्मों और वृतचित्रों के समारोह हुए। फिल्मफेयर अवॉर्ड आयोजित करनेवाला तो मुंबई का सिर्फ तीसरा थियेटर है रीगल। १९५० के दशक में यह अवॉर्ड का एकमात्र ठिकाना था। जब भी यह अवॉर्ड होता सुर्मई शाम में पूरी इमारत रंग-बिरंगे बल्बों की रोशनियों से घिर जाती। गेट पर फिल्मफेयर ट्रॉफी का एक बड़ा सा ‘कटआउट’ दूर से ही ध्यान खींच लेता और कारों से एक के बाद एक उतरते सितारों की एक नजर के लिए थियेटर के बाहर सिनेमा प्रेमियों का मजमा जमा होता। यहूदी मैनुहिन जैसे विश्व विख्यात वायलिन वादक और जाने-माने गायक मेरियन एंडर्सन ने भी कार्यक्रमों के लिए यही स्थान चुना। मुंबई के अपने फिल्मोत्सव MAMI की फिल्मों के प्रदर्शन का लीड थिएटर तो यह कई बार रहा।
कोई डेढ़ दशक पहले बढ़ती मल्टीप्लेक्स संस्कृति के बीच महानगर के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों पर मंदी का नजला जब टूटा, तब शहर के अन्य सिनेमाघरों की तरह रीगल भी प्रभावित हुआ। हालत यह हुई कि ९० के दशक में जब हाउसफुल के बोर्ड यहां आम होते थे। २१ वीं सदी के दूसरे दशक में सिनेमाघर टिकट दर केवल१५० से २५० रुपए के बीच होने के बावजूद कुल क्षमता के १५-२० प्रतिशत दर्शक भी मुश्किल से जुटा पाने में असमर्थ हो गया। २०१८ में इसका वार्षिक नुकसान एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया। आज से पांच-छह वर्ष पहले ऐसा लगने लगा कि छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सामने ग्लोब सिनेमा के अपने दूसरे थिएटर ‘ कैपिटॉल’ की तरह यह भी बंद हो जाएगा। अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया ने इसके मर्सिए लिखने शुरू कर दिए। ऐसे में थिएटर मालिकों ने दर्शकों को व्यक्तिगत संदेश भेजकर उनसे यह नौबत नहीं आने देने की गुहार की। आम सिने प्रेमियों ने भी व्हॉट्सऐप और ट्विटर जैसे माध्यमों से इसमें लगनेवाली फिल्मों की जानकारी देते हुए दर्शकों को यहां आने के लिए प्रोत्साहित किया। फिल्म प्रदर्शन और कारोबार से जुड़े लोगों ने मदद का हाथ बढ़ाया। परिणाम, रीगल आज मौजूद है, भले ही कुछ बदले अवतार में। क्रमश:
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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