मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : बरदेखाई...

अवधी व्यंग्य : बरदेखाई…

एड. राजीव मिश्र मुंबई

जब से परबतिया बड़ी भई है, जगेसर दिन रात ओहिके बियाह के चिंता मा डूबि रहे हैं। गाँव जवार से लइके नात-हित सबके काने लागि गए पर लड़की जोग कउनउ लड़िका आँखिन मा नाही देखाय रहा है। यही उधेड़बुन मा उलझे जगेसर बइठे रहे तब तक उनके पड़ोसी छुट्टन आई गयें। का हो जगेसर! कहाँ दिमाग गुल्ल होई गवा है भइया? का कही छुट्टन ई परबतिया जब से बियाह जोग भई है कउनो लड़िका नही नजर मा देखाति अहइ। अच्छा, तो तू परबतिया के पहाड़ मूड़ पर उठाये बइठे हो। अरे, उ अपने बदलापुर वाले सभाजीत हैं न ओनके जेठ लड़िका प्रेमजीत के करो बियाह। कवन सभाजीत उ जवन तहसील मा दलाली करत हैं? अरे यार, बुड़बकय हो का पूरा ओहिका दलाली नाही नेतागिरी कहत हैं। दुई जुवार के खेती है लड़िका रेलवई मा लागि गवा है अउर का चाही। आपन परबतिया राज करी ओहि घर मा, बोलो तो कालि चलो घर दुआर देखि आओ। दूसरे दिन छुट्टन के साथ जगेसर सुफेद कुरता-पायजामा के ऊपर लकालक गमछा लपेटि के दुआरे पहुँचि गए। लड़िका के बाप सभाजीत छुट्टन के देखतय, आवा हो लंबरदार। गोलुआ हए रे! खटिया निकार लंबरदार आय हए। जगेसर जइसे खटिया मा बइठे, खटिया के बाध जमीन चूमे लाग। जगेसर के समझ में नही आई रहा है कि उ खटिया पे बइठे हैं कि खटिया ओनके ऊपर बईठी अहइ। खैर, कइसे चल्यो छुट्टन? उ का है भइया ई हैं हमरे परोसी जगेसर इन कर एकठो बिटिया बियाह जोग होइ गयी है तो अपने प्रेमजीत के देखय आय अहइ। तब तक अंदर से बिस्कुट अउर पानी आवा, लो पानी पियो। अइसा है लंबरदार बियाह तो करै के अहइ पर परेमवा आगे पढ़ाई करे के सोचति है। पानी पी के जगेसर गिलास नीचे रखि के बोलि परे, त पढ़े देव बियाह मा काव दिक्कत अहई? अरे, गजबै बतियावत हौ, पढ़ाई लड़िका के खेल है का? मोट-मोट किताब पढ़ै के परत है। अरे, तो हमार परबतिया कवन छोटि अहई जवन तोहरे लड़िका के कापी-किताब फारि देइ। देखो सभाजीत बियाह करै के होय तो बियाह करो नाही तो पहिले लड़िका पढ़ाई लेव। खटिया त ओनचि नाही पावत हौ लड़िका का पढ़इहौ, चला हो छुट्टन कहति जगेसर सैकिल के पैडिल मारि दिहेन।

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