मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : लड़िका तऽ सोना है सोना

अवधी व्यंग्य : लड़िका तऽ सोना है सोना

एड. राजीव मिश्र मुंबई

जगेसर के सभाजीत के इहाँ से लउटे के बाद केहू बताईस कि बरईपार वाले गजोधर के लड़िका देखि आओ बहुत नीक है। बस जगेसर बरईपार जाय पहुँचि गए।
गाँव के बाहर एक मनई से पूछे, ‘गजोधर के घर कउन है लंबरदार?’
‘कउनउ काम है का?’ मनई बोला।
जगेसर खिसियाई के बोले, ‘अरे भइया, बरदेखाई मा आवा हई।’
‘चलो उ जवन हवेली देखात है उहै गजोधर के घर अहइ।’ बात के बात मा गजोधर के दुआरे पहुँचि के मनई हाँक लगाइस, ‘गजोधर अहा हो? देखो मास्टर के बियाह खातिर आये हैं।’
गजोधर से पहिले उ मनई बोलि परा, ‘गाँव मा इनके मुकाबिला में के है? इनके दादा बंगाल से बैलगाड़ी मा रुपिया लादि के लावत रहें। हमरे दद्दा हरे इनके दद्दा के पीठ खजुवाई के हजारन अशरफी पाई गएन।’
मनई कय बात सुनकर जगेसर बोलि परें, ‘ओनके खुजली के बीमारी रहा का?’
उ मनई मुला अपनहि धुन मा, ‘उ बिजुरी के बड़का खम्हा देखत हव, उहाँ से लइके दुई कोस तक गजोधरय भइया हयेन।’ तब तक जगेसर बिस्कुट की तरफ देखि बात मा लागि गयें अउर पल भर मा बिस्कुट साफ कइके फिर से मनयवा बोलय लाग, ‘उ जवन हमरे दुआरे टरकटर खड़ा है, उ इनके दद्दा हमरे बाबू के डरायवरी मा दिहे रहें।’ अब तो गजोधर भी कंफ्यूजिया गयें कि बिना डोरा के ई त बहुतै ऊँची उड़ाई दिहिस। मौका देखि गजोधर बोले, ‘भइया सादी बियाह संजोग के खेला अहइ, वैइसे आवै के तो सुबह-शाम मेला लागि अहइ। अबही कालि हो नेता, मछरी के गाँव के चंधारी आवा रहें, हम एक आखर नाही बोले उ अपने मुँहे से एक ठो बोलेरो और पाँच लाख रुपिया पे खूँटा गाड़ि के बइठे रहें, पर भइया जहाँ भाबी संजोग होई बियाह त उहीं होई।’
‘भैया लड़िकउ का करत हैं?’ जगेसर पूछ बैठे।
‘भैया इनकर लड़िका त सोना है सोना, पूरे बिरगिट मा पंचलाईट लेइ के घुमिहो तबहुँ अस लड़िका न पइहो। बस यहि बरिस मैट्रिक पास हुई जाय तो नेता पचासव लाख दिहे भी बियाह न मनिहैं।’ उ मनई बोलि परा।
‘नेता तोहरे बाबू और दद्दा घरे हयेन?’ जगेसर पूछे।
‘नाही भइया उ तो सुरलोक गयें।’ मनई के इतना बोलतय ‘त तू चार ठो बिस्कुट पे अब गजोधर के पीठ खजुवावा’ कहिके जगेसर उहां से नौ दुई ग्यारह होई गए।

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