मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : परेमवा की मैना

अवधी व्यंग्य : परेमवा की मैना

एड.राजीव मिश्र मुंबई

‘तुमसे मिलने को दिल करता है’ गाना गावत परेमवा खेत के मेड़ पर खरहा के जैइसन कुलाँचि भरि रहा है। अउर भरय काहें ना आज बगल वाले गाँव के मैना से नयन जौ लड़ि गवा है। घर पहुँचतय सीसा के सामने मुस्कियाय मुस्कियाय के परेमवा बार फेरय लाग। भुलई कुछ पूछे ओकरे पहिले परेमवा बोलि परा, ‘सुनो बाबू हम तोहरे खातिर बहुरिया ढूढ़ि लिए हैं। बगल वाले गाँव के बल्ली पहलवान के बिटिया है न मैनवा, उही से हमरा नैन लड़ि गवा है। अब लगन होई त उही से होई।’ परेमवा के मुंह से एतना सुनतै ही मानो भुलई के साँप सूँघि गवा, ‘अरे, बउरहवा उ बल्लिया पूरे बिरगिट मा परसिद्ध अहइ। उ जेहिका कुटिस एक्कउ हड्डी बची नाय।’
‘बाबू तुम बइठो घर मा, अब परेमवा को मैना से मिलय से कउनउ सरहद रोक नाही सकत। अरे, जब तारा सिंह का अशरफ नाही रोकि पायें तो हमका बल्ली रोकि लेईहैं।’ भुलई बकुला की नाय परेमवा के मुँह निहारत रहि गए अउर परेमवा पल भर मा एक दुई तीन होई गवा। एक घंटा बादि पड़ोस के लड़िका हाँफत आवा, ‘अरे सुनो दद्दा, अपने परेमवा के लौधरपुर के बल्ली पहलवान हुमुचि-हुमुचि के कूटि रहें हैं।’ एतना सुनतै भुलई के परान सूखि गवा, ‘हे राम, ई लड़िका हमार बुढ़ौती खराब कइके मानी।’ भुलई डर के मारे थर-थर काँपै लागे तब तक परेमवा के माई घर से निकसी, ‘सुनो, तू इहाँ बइठे हो और उहाँ परेमवा भुरकुसात अहइ। तोहसे नीक उ तारा सिंह रहे जे अपने जीते बिना पाकिस्तान मा कूदि गयें। अरे, जाओ जाइके बल्लिया के दुआरे के चापाकल उपारि के तारा सिंह बनि जाओ। पूरा गाँव जवार मा तोहरे नाम के डंका बाजि जाई।’
‘अरे, पलिहरे के दूब त उपरति नाही चापाकल का घुँईया उपारि लेब, जात अही अब भगवानय मालिक अहइ।’
भुलई दुरियय से देखेन, बल्लिया परेमवा के लथेर लथेर के मारि रहा है। भुलई तारा सिंह इस्टाइल मा जोर से चिल्लाय परें, ‘बल्लियाऽऽऽ…!’ बस एतना सुनतै बल्ली परेमवा के छोड़ि भुलई के पकड़ि के उहीं चापाकल पे जवन मार मारे की भुलई मुँह से फेचकुर फेंकिं दिहें अउर उहाँ ओनकर जीते एक्वैâ साँस मा दुआरे आइके रुके। पिछले एक हफ्ता से घर मा दुई खटिया परी अहइ। एक पे तारा दूसरे पे जीते लतियाये पीटे परे हैं।

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