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अवधी व्यंग्य: पैरेंट-डे

एड. राजीव मिश्र मुंबई

लालजी आज सुबहिये से घनघोर टेंशन मा चलि रहा हैं। टिपुआ के इस्कूल मा आज पैरेंट-डे है। टिपुआ कहिस रहा कि बाबू, पिरिसपल साहेब तोहका बुलाए हैं। ठीक दस बजे लालजी सीधे पिरिसपल साहेब के ऑफिस मा जाय धमके। पिरिसपल साहेब लालजी को ऊपर से नीचे तक पैमाइश करे के बाद बोलि परे, तुमही हौ टीपू के पापा? जी साहेब टिपुआ हमरहि लड़िका है। का भवा साहेब टिपुआ कउनउ शैतानी किहिस का? नही नही उ तो बहुतै सीधा लड़िका है। उ का है आजकल उ पढ़ाई पे धियान नही देइ रहा है। जवन पढ़ावा जात है दूसरे दिन भूलि जात है। साहेब फीस तो हम पूरी भरे हैं! अरे, फीस को माँगत है? हम ई कहि रहे हैं ओहिका धियान पढ़ाई मा नही लागत है, कुछ करौ ओहिका। साहब उ तो घर से इस्वूâल बदे रोजै निकरत है। अरे उ स्वूâल तो रोजै आवत है। साहेब आप जहाँ से कहे रह्यौ उहीं से कापिऊ किताब लिए रहे। अब पिरिसपल साहेब गुस्सा के गुड़गांव होइ चुके रहें अउर चिल्लाय के बोले, एक दम्मई से बकलोल हो का? हम कहि रहे हैं टिपुआ पढ़ाई में धियान नही देता अउर तू फीस, कापी-किताब अउर भलतय बतियावत हौ। यतना सुनतय लालजी इतने जोर से मेज पर हाथ पटकिन कि मेज पे रखा पेपरवेट पिरिसपल साहेब के गोड़ के अँगुरी भुरकुसि दिहिस। पिरिसपल साहेब चिचियात बोले ई का है लालजी? इहै तो हम पूछा चाहत हई पिरिसपल साहेब, ई का है? जब हम इगारह सै महीना के फीस, डिरेस, कापी-किताब, बस्ता अउर तो अउर सोरह सै बस के अलग से अउर तू कहत हौ ओहिके पढ़ाई मा धियान नही लगत है? सुबह से शाम तक उ इस्कूल माहिया है, कवन मास्टर रक्खे हव जे सात बरिस के लड़िका नही पढ़ाई सकत है। यहि इस्कूल के सब मास्टरन के पहिले पढ़ै भेजो, ओहिके बाद हमैं बोलाई के गियान दिहो। एक तो माई-बाप कुर्बान होइ जात है तू टाई लगाई के गोपलचउथ करत हौ। बड़का पिरिसपल बना अहा। लालजी के बात सुनिके पिरिसपल साहेब के मानो साँप सूँघि गवा होय अउर लालजी वंदे भारत टरेन की तरह धड़धड़ात पिरिसपल ऑफिस से निकरि गए।

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