मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : सपनहवा बाबा

अवधी व्यंग्य : सपनहवा बाबा

एड. राजीव मिश्र
मुंबई

चार दिन से लागत है ठंडी सबके मुआइ के मानी। घर-घर मा लकड़ी के बोटा सुलगि रहा है, जेहिके भरोसे गाँव-जवार के बूढ़-पुरनिया जमराज के गच्चा देइ रहे हैं। दुइ दिन से चित्रगुप्त धरती से बिना केहू के लिए जब जमपुरी पहुँचे तो जमराज के दिमाग खराब हुइ गवा। देखो चित्रगुप्त, अइसे न चल पाई। रोज ऑफिस टाइम से निकरत हौ अउर काम धेला भर कर नही होत। आखिर, चलि का रहा है धरती पर? अइसा है महाराज धरती पर कटकटहवा ठंडी पड़ि रही है। कुछ तो रजाई के बहरे नही आवत हैं अउर जवन आवत हैं उ सब बोटा सुलगाये बइठे हैं। अब तुमहीं बताओ महाराज, कइसे उठाई लोगन के? अरे, तो तू कहिया से आग-पानी से डेराय लागया? अरे महाराज, आग-पानी से डर नाही लागत है, जवन आगि के आगे बइठे हैं उ सब राम-चर्चा में लगे हैं। तव का सब के सब भगवत भजन में लगे हैं? नही प्रभु, कुछ तो बहुतै नास्तिक हैं, उ तो भगवान राम के भी भला-बुरा कहि रहे हैं। तो उन्हीं का उठाय लाओ। देखो मार्च क्लोजिंग आय रहा है, टारगेट न पूरा करिहौ त परमोशन न होई। एक काम करो, आज हम चलबय तोहरे साथ मा। रात ८ बजे चित्रगुप्त अउर जमराज दुनहु जन जमपुरी से प्रयागराज मा लैंड किहिन। संगम तट पर पहुँचि के जमराज चित्रगुप्त से कहिन, तनिक रुकौ, हम संगम मा स्नान कई लेई। चित्रगुप्त के मना करे से पहिलय जमराज झम्म से संगम मा कूदि परें। बाहर निकरे तो पूरा शरीर अकड़ि के बनबेल होई गई। चित्रगुप्त जल्दी से आग के बेवस्था करो नही तो जान न बची। यहि रूप मा केहिके घरे कौड़ा तापय जइहौ? अइसा करो, रूप बदलो तबै जान बची। रूप बदलिके जमराज जइसय एक गाँव मा कौड़ा के लगे पहुँचे लोग बाग राम चर्चा में लागि रहें कि २२ के प्रभु आइ जइहै। तब तक एक लड़िका के नजर जमराज के बदले रूप पर परि गय। अरे हे दद्दा, ई देखो सपनहवा बाबा आय गयें जवन कहत रहें कि रामजी उनके सपना में आइके कहिन रहे कि हम अइबे नही करेंगे। धर-धर निकार लाठी भागय ना पावै। इतना सुनतै चित्रगुप्त त एक दुइ तीन हुइ गए अउर यमराज के भागत-भागत दुइ लाठी कमर पे पड़ि गय। तब से यमराज बही खाता लइके धरती पर डेरा डारि दिहे हैं।

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