मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : वैभवलक्ष्मी कै दया

अवधी व्यंग्य : वैभवलक्ष्मी कै दया

एड. राजीव मिश्र मुंबई

फेरन लेखपाल अपने दुआरे पर कागज अउर कलम लइके गहरी सोच में डूबे रहें तब तक दूसरी ओर से पदारथ हाथी के मदमस्त चाल में पहुँचि गयें। का हो फेरन, कहाँ सोच के सहारनपुर हो गए भैया? फेरन लंबी साँस लइके बोले तो लागि आवाज कउनउ झुरान इनारे में से निकरत होय। का बताई पदारथ! पहिले नवरातर गवा फिर दशहरा आवा, दशहरा गवा त करवा चउथ, अब करवा गवा त अमवसा आई गवा पर हम मरदन के हालत में कउनउ सुधार नाही भवा। अरे का फेरन, दीवाली आई रही है लक्ष्मी के पूजा करौ सब चिंता मिटि जाई। उ त भइया नवरातर मा भी कीन्ह रहे पर दशहरा के दिनै से तोहार भउजी कहै चालू कीन्ह है कि अपने अंदर के रावण के मारो पहिले। अब बतावा नौ दिन के बरत मा हमरे बदन मा रावण घुसि गवा? अब अंदर के रावण फूंकि देबय तो कचहरी मा वसूली के हिम्मत कहाँ से पैदा होई? दीवाली आवै वाली अहइ घर मा रंग-रोगन करवावय के है उही चिंता में परे हैं। यहि बरिस धनतेरस पर तोहरे भउजी बिना झुमका के मनिहै न, बस उही के हिसाब-किताब मा लागि है पदारथ, कहतै फेरन मोटरसाइकिल मा सेल्फ मारि दिहिन। कचहरी पहुँचतय तहसीलदार बोलाय लिहिन। अइसा है फेरन रामपुर मौजा तोहरे पास है न? हाँ साहेब! एक अरजेंट पैमाइश है, काश्तकार मुम्बइया मालदार है बाकी तो तू पुरान अजगर अह। अइसन पैमाइश किहो कि दीवाली के मजा आई जाय। फेरन नक्शा, गोनिया, लाठा अउर जरीब लइके पहुँचि गयें। पैमाइश शुरू होइ गयी, दुइ मनई लाठा अउर जरीब लइके घूमै लगे अउर फेरन नक्शा में अइसन गोनिया घुमाए कि काश्तकार के पुश्तैनी जमीन मा ५ बिसुआ ग्राम समाज निकारि दीहें अउर मुंशी से कहें कि रपट बनाओ जी, बेदखली के अंधेर मचि गवा है। आखिर मा फेरन अउर काश्तकार मा कुछ अइसन समझौता भवा कि फेरनबो के कान मा झुमका अउर तहसीलदार साहेब के घर मा डबल डोर के फिरिज पहुँचि गवा। आखिर वैभवलक्ष्मी यहि दीवाली पे दूनौ भक्त के ऊपर अइसन दया किहिन कि दूनौ घर के गृहलक्ष्मी के खुशमखुश होइ गयीं।

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