मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : यत्र पूज्यन्ते नारी

अवधी व्यंग्य : यत्र पूज्यन्ते नारी

एड. राजीव मिश्र मुंबई

जब से जगेसर के बहुरिया आई है तब से ओकरे रूप-रंग के चर्चा पूरे गाँव मा आगि की तरह पैâलि गवा है। गाँव के बड़ बुजुरुग से लइके लरकियन तक सबकी जुबान पर बहुरिया के नाम नाचि रहा है। अब जब सगरे गाँव मा जगेसर-बौ के सुंदरता चर्चा हो अउर गाँव के लरिकन का छाती पर साँप नही लोटय अइसन होई सकत है का? लेकिन कलपा के सुरक्षा घेरा का तोरि कोउ घर मा घुसि जाय ई बात कोउ सोचि नही सकत। दस महीना बीति गवा पर मजाल का कोउ बहुरिया के ठोढ़ी भी देखि पाए होय। होरी के दस दिन पहिले गाँव के अकेले मरद भुलई जेहिका तीस लगन के बादि भी हरदी नाही नसीब भई जगेसर बो के रूप-दर्शन खातिर कमर कसि लिहै। दुई दिन तक कलपा के पालागी चाची के असिरबाद लइके तीसरे दिन जगेसर के ओसारे मा जाई धमके। कलपा चाची दरवाजे पर लंकिनी के धर्म निबाहत बैठि रहीं। ‘का रे भुलईया आजकालि एहर के चक्कर बहुत लागय लागि?’ भुलई दाँत चियारत ‘नाही चाची बस होरी का तैयारी मा लागि है।’ एतने मा किवाड़ के पल्ला पकरि जगेसरा बो ‘अम्मा खाना निकारी’ सुनतै भुलई के कान मा मानो शहद घुलि गवा। जान गदोरी पे राखि बोलि परे, ‘चाची भौजी से कहो एक लोटा पानी देइ देय बहुतै पियास लागि है।’ इतना सुनतय कलपा के कान खड़ा होई गवा। ‘का रे भुलईया, जगेसरा से पाँच बरिस जेठ होई के बाद भी बहुरिया तोर भौजाई कइसे होय गई? तोहका साठ बरिस तक हरदी ना लगी त, तै देवरे रहिबे का रे?’ एतने मा बहुरिया लोटा के पानी रखि के जाय लगी भुलई लपक के दुलहिन के आगे जाई ठाढ़ि होई गए। भुलई के गबरढिठाई देखि कलपा गुस्सा से लाल हुई गयी। ‘मुँहझऊसा हमार घर मणिपुर अउर झारखंड समझा है का रे? बहुरिया के घूँघट के हाथ लगायौ तो हाथ उपारि के खूंटी पर टांगि देब। निकरि जाव नाही त आज हरदी-पियाज साथै लगि जाई।’ कलपा के चंडिका रूप देखिके भुलई जौ भागा है आज तक होरी मा बाहर नही निकरिस।

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