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उधारी के दलदल में बैंकों की इकोनॉमी! … अर्थ व्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक असर

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
बैंकों से लाखों, करोड़ों रुपए कर्ज लेकर खुद को दिवालिया घोषित करनेवाले कारोबारियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इनमें से विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी जैसे कई कारोबारी तो कर्ज डुबाकर देश से बाहर भी भाग चुके हैं। दूसरी ओर सरकार हर साल लाखों-करोड़ों रुपए के ऐसे कर्ज को एनपीए होने पर राइट ऑफ कर देती है अर्थात डूबी हुई रकम (बट्टे खाते में) घोषित कर देती है। केंद्र सरकार के ऐसे निर्णयों से बैंकों की इकोनॉमी उधारी के दलदल में धंसती जा रही है। इसका व्यापक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई जाने लगी है।
बता दें कि तरलता की स्थिति में ढांचागत बदलाव होने से अधिशेष नकदी बहुत कम हो गई और उधारी तेजी से बढ़ने के कारण बैंक इस वित्त वर्ष में लघु अव​धि के ऋण पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों से पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष में अब तक बैंकों ने औसतन ४.२ लाख करोड़ रुपए उधार लिए हैं, जबकि पिछले वित्त वर्ष में औसत उधारी केवल २.६ लाख करोड़ रुपए थी। आरबीआई के आंकड़े हर पखवाड़े बदलते हैं और ताजा आंकड़ों में मार्च के दूसरे पखवाड़े में नकदी की स्थिति ज्यादा तंग होती दिख रही है, इसलिए वित्त वर्ष के बाकी दो पखवाड़ों में बैंक उधारी बढ़ने की संभावना है। कुल मिलाकर, मौद्रिक ढिलाई खत्म करने के आरबीआई के प्रयासों से अधिशेष नकदी में तेज कमी आई और सितंबर २०२२ में पहली बार बैंक उधारी ५ लाख करोड़ रुपए के पार चली गई। अक्टूबर में भी उधारी उससे ऊपर ही रही।

विश्लेषकों ने जताई चिंता
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के निदेशक सौम्यजीत नियोगी ने मीडिया को बताया कि ‘असल में उधारी का एक हिस्सा शुद्ध रूप से ५०-६० हजार करोड़ रुपए के इंप्रâास्ट्रक्चर तथा अन्य बॉन्ड के रूप में है।’ उन्होंने कहा, ‘ऋण वृद्धि जब मजबूत और टिकाऊ होती है तो बैंकों को अंतत: अ​धिक जमा जैसे स्थिर समाधान तलाशने पड़ते हैं। वे कम मियाद की उधारी के दम पर ज्यादा कर्ज नहीं दे सकते।’ विश्लेषकों ने बैंक ऋण वृद्धि और जमा वृद्धि के बीच बड़ी खाई पर चिंता जताते हुए कहा कि कई नए कारण इसकी वजह हो सकते हैं।

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