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बेबाक : राजनैतिक आपातकाल और ‘अंगद’ की चुनौती!

  • अनिल तिवारी 

इस वक्त देश स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है, आजादी के ७५ वर्षों की उपलब्धियां गिना रहा है। आए दिन आभास कराया जा रहा है कि देश में चहुंओर खुशहाली है। दावा है कि देश के तमाम प्रश्न, हाल के कुछ वर्षों में हल हो चुके हैं और देश स्वच्छंद होकर ‘विकास’ की राह पर तेजी से दौड़ रहा है। परंतु क्या वाकई में सब कुछ ऐसा ही हो रहा है? आजादी के ७५ वर्षों बाद, क्या सच में देश का वातावरण ‘अमृतमय’ हो चुका है? या फिर महंगाई, बेरोजगारी, धार्मिक अराजकता और राजनीतिक द्वेष के जहर से देश की आत्मा, संविधान की सांसें और प्रजातंत्र के प्राण उखड़ने लगे हैं। इन सभी प्रश्नों का जवाब निश्चित ही नकारात्मक है, इसलिए यहां यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि २०१९ में दुनियाभर में जिस जानलेवा कोविड ने दस्तक दी थी, क्या उसके राजनैतिक वैरिएंट ने २०१४ में ही हिंदुस्थान में कदम रख दिया था? यदि हां, तो क्या आज ८ वर्षों बाद भी उससे न केवल आम जनता, बल्कि इस देश के प्रजातंत्र की रीढ़ माने जानेवाले विपक्ष को भी बुरी तरह से संक्रमित किया जा रहा है। उन्हें दम तोड़ने को मजबूर किया जा रहा है? क्या केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए ‘लॉक’डाउन सेशन जारी रखा जा रहा है?
खैर, मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूर-ए-खुदा होता है। ‘वायरस’ चाहे कितना ही घातक क्यों न हो, फिर चाहे वो बायोलॉजिकल हो पॉलिटिकल, एक-न-एक दिन उसकी काट दुनिया को मिल ही जाती है और अंतत: उसकी पराजय भी होती है और उसे एक दिन निष्प्रभावी भी होना ही पड़ता है। सनद रहे कि जब कभी भी मसला बायोलॉजिकल का उठा हो या मामला पॉलिटिकल वायरस का रहा हो, उसे निष्प्रभावी करने के लिए हमेशा पहला टीका महाराष्ट्र की धरती पर ही बना है। महाराष्ट्र वाहवाही का ढोल भले ही न पीटता हो, पर वो नतीजों की ‘डोज’ बनाना बखूबी जानता है। यह एक ऐसा प्रदेश है, जहां लोग बात-बात पर सड़कों पर नहीं उतरते। खासकर, राजनैतिक कारणों से तो बहुत ही कम। परंतु यहां का हर एक नागरिक राजनैतिक रूप से सुधी है। वो भले ही दर्शाता न हो लेकिन वो राजनीति की हर चाल, हर षड्यंत्र को भली-भांति समझता है और उस पर अपने परिवार में, अपने मित्र-रिश्तेदारों में विस्तृत चर्चा भी करता है। अंतत: अपनी सोच और समझ का प्रमाण मतपेटी में डिपॉजिट करना भी नहीं भूलता। उसका नतीजा क्या होता आया है? और इस बार क्या होगा, २०२४ की तस्वीर कैसी होगी? इसकी ताजातरीन झलक युवासेनाप्रमुख आदित्य ठाकरे की ‘निष्ठा यात्रा’ ने दिखा दी है। उनकी इस यात्रा में उमड़े जनसैलाब को देखकर कोई भी राजनीतिक पंडित आसानी से महाराष्ट्र के राजनीतिक भविष्य का अनुमान लगा सकता है क्योंकि उस सैलाब में केवल शिवसैनिक ही शामिल नहीं हो रहे थे, बल्कि महाराष्ट्र का वो आम नागरिक भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था, जो हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के प्रति या उनके परिवार के साथ कभी घात मंजूर नहीं कर सकता। वो अतीत में भी बालासाहेब के साथ कंधे-से-कंधा  मिलाकर खड़ा रहा है और वो आज भी उनके परिवार और पार्टी के लिए ‘ढाल’ बनकर खड़ा है। आम हालातों में भले ही वो घर पर ही राजनीतिक विश्लेषण करके इतिश्री कर लेता हो, पर अन्याय के हर दौर में वो पूरे दमखम से सड़कों पर उतरता है।
आज भले ही साम-दाम-दंड-भेद और जोड़-तोड़ का दमनचक्र चलाकर भारतीय जनता पार्टी ने किसी के कंधे पर पैर रखकर सत्ता स्थापित कर ली हो, पर जल्द ही उसे एहसास हो जाएगा कि यह ‘रात’ की भूल, उसकी ‘सुबह’ वाली भूल से भी भयंकर थी। जो न केवल उन प्यादों को, जिनके सहारे सत्ता स्थापित करने का खेल खेला गया है, का राजनैतिक करियर खत्म करेगी, बल्कि भाजपा की कथित जीत के अश्वमेध पर अंकुश की शुरुआत भी होगी। क्योंकि यह भूल उसने छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र में की है, उस महाराष्ट्र में, जो सब कुछ सहन कर सकता है, गद्दारी हजम नहीं कर पाता। फिर वो आज का समय हो या पेशवा-मराठों का साम्राज्य काल। महाराष्ट्र ने हमेशा गद्दारों को सबक सिखाया है। दमनकारियों, तानाशाहों और विस्तारवादी सोच को कुचलने का काम किया है। महाराष्ट्र का आम जनमानस ‘गद्दारी की गद्दी’ पर विराजमान इस सरकार को पचा नहीं पा रहा। उस पर, शिवसेना को खत्म करने की और उसके नेताओं को प्रताड़ित करने की गतिविधियां ज्यों-ज्यों तेज हो रही हैं, महाराष्ट्र में शिवसेना के प्रति उतना ही जनसमर्थन तैयार होता जा रहा है। अपितु, देशभर में विपक्ष के खिलाफ दमनचक्र चलाकर एक तरह से मोदी सरकार विपक्ष को मजबूत ही कर रही है। उन्हें एकजुट ही कर रही है। इसी अत्याचार को देखकर आम जनता विपक्ष के समर्थन में खुलकर उतर रही है। महाराष्ट्र के भूमिपुत्र तो भूमिपुत्र, यहां पीढ़ियों से रह रहे अन्य भाषिक भी, जो दशकों से यहां की संस्कृति-सभ्यता में रच-बस गए हैं, यहां के मतदाता बन चुके हैं, उन्हें भी ये गद्दारी और गद्दारी के पीछे का जमूरोंवाला खेल पच नहीं रहा है। यहां का उत्तर भारतीय समाज हो, राजस्थानी हो, उत्तर-दक्षिण-पूर्व वासी हो, यहां तक कि गुजरात का गुजराती हो, किसी को भी प्रतिशोध वाली राजनीति बर्दाश्त नहीं हो रही है। उसी की तस्वीर इन दिनों लगातार शिवसेना की जनसभाओं से लेकर ‘मातोश्री’ के बाहर नजर आ रही है। न केवल महाराष्ट्र, बल्कि देश के तमाम राज्यों से हर दिन हजारों शिवसैनिक ‘मातोश्री’ पहुंच रहे हैं। शिवसेना भवन में इकट्ठा हो रहे हैं। पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा और समर्थन की ‘शपथ’ ले रहे हैं। उसे देखकर इस नई भाजपा के प्रति पनप रहे आक्रोश को साफ समझा जा सकता है। ये लोग, ये नागरिक, ये शिवसैनिक व शिवसेना समर्थक, बालासाहेब के परिवार को स्वार्थवश परेशान करनेवालों को करारा जवाब देने को आतुर हैं। वे भले ही परप्रांतीय हों, गुजराती ही क्यों न हों, कोई भी भाजपा के चंद नेताओं के हाथ राष्ट्र और महाराष्ट्र की अस्मिता गिरवी नहीं रखवाना चाहता। ये उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं है। अर्थात, जब महाराष्ट्र के नवनियुक्त मुख्यमंत्री एक महीने के ही कार्यकाल में छह-छह बार दिल्ली दरबार में नतमस्तक हो आते हैं, उसमें भी कई बार बैरंग लौटते हैं तो मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़नेवाला आम महाराष्ट्रीयन यह बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पाता। वो ऐसे मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से मराठी अस्मिता बरकरार रखने की उम्मीद कैसे  पाल सकता है, जिनकी खुद ही की रीढ़ की हड्डी कमजोर हो। वो ऐसे उपमुख्यमंत्री से क्या उम्मीद रख सकता है, जिनका एक पैर मुंबई में तो दूसरा हमेशा दिल्ली में रहता हो, जो हर फैसला  दिल्लीश्वरों के इशारे पर लेता हो। इससे कम-से-कम इतना तो प्रतिबिंबित होता ही है कि बार-बार जोर देकर रोज ये कहनेवाले, ‘मी पुन्हा येईन’ (मैं फिर आऊंगा) वालों के लिए अब शायद फिर से मुख्यमंत्री बनने का इंतजार और लंबा हो जाए।
भाजपा ने शिंदे की आड़ में सत्ता हासिल करके शिवसेना को खत्म करने का जो कदम उठाया है वो शिंदे और फडणवीस दोनों की राजनीति को सीमित या समाप्त करने के लिए काफी है। आज नहीं तो कल शिंदे इसका खामियाजा जरूर भुगतेंगे, यह तो तय ही है। जबकि सत्ता स्थापित होने के साथ ही भाजपा आलाकमान ने फडणवीस के हिस्से का खामियाजा वसूल लिया है। फडणवीस चाहे नवनियुक्त मुख्यमंत्री की कुर्सी से कुर्सी सटाकर, हर मौके पर बराबरी का एहसास कराने की पुरजोर कोशिश भले ही करते हों, पर अंदर-अंदर वे जानते हैं कि उनका कद, उन्हीं की पार्टी ने कितना बौना कर दिया है! उनके चेहरे की बनावटी मुस्कान हर बार चीख-चीखकर इसकी गवाही भी देती है। खैर, अब मामला जनता के कोर्ट में है। जहां फैसला  केवल महाराष्ट्र की सत्ता का नहीं होना है, बल्कि यहां निर्णय महाराष्ट्र की आनेवाली राजनीति की दिशा तय करने का भी होना है। यह फैसला शिवसेना को अप्रत्याशित रूप से मजबूत करनेवाला साबित होनेवाला है। आदित्य ठाकरे की जनसभाओं को मिले तूफानी जनसमर्थन ने यह संकेत भी दे दिया है कि २०१४ के लोकसभा चुनाव के वक्त जो जनमानस शिवसेना-भाजपा, खासकर मोदी के लिए उमड़ता था, वो आज शिवसेना के युवा नेतृत्व के प्रति कृतसंकल्प है। उसे इस बात का अटूट विश्वास हो गया है कि शिवसेना के साथ अन्याय किया जा रहा है। हर स्तर पर, हर मोर्चे पर और हर तरह से। ये अन्याय प्राकृतिक होता तो शायद वो आंदोलित न भी होता, परंतु यह तो कृत्रिम है। कृत्रिम तौर पर यह चंद लोगों द्वारा साजिशन कराया जा रहा है। उन लोगों द्वारा जो अपनी लोकप्रियता दिन-ब-दिन खोते जा रहे हैं। उन्हें अब अपनी सत्ता जाने का डर रात-दिन सताने लगा है। इसलिए वे देश की राजनीति में खुद के अलावा सभी विकल्पों को खत्म कर देना चाहते हैं। जनता के समक्ष कोई भी पर्याय शेष नहीं छोड़ना चाहते हैं और तानाशाही की हर पराकाष्ठा कर लेना चाहते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि हर अन्याय का अंत होता ही है। दमन का भी नाश होता है। यहां संकेत साफ हैं कि इस देश में नई भाजपा का ईरा अब जल्द ही खत्म होगा और एक बार फिर शिवसेना का दौर लौटेगा। ‘निष्ठा यात्रा’ की हालिया तस्वीरें तो केवल झांकी हैं, अभी तो पूरी फिल्म बाकी है। अभी तो शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने कदम बाहर भी नहीं रखे हैं कि भाजपा के पैरों तले जमीन खिसकने लगी है। अब तक तो केवल शिवसेना के ‘अंगद’ ने ललकार भर दी है कि ‘रावण रूपी’ अहंकार का सिंहासन डोलने लगा है। भाजपाइयों की फौज को अब स्पष्ट नजर आने लगा है कि उनकी इस एकमात्र चूक ने २०२४ के बदलाव की नींव रख दी है। ये चूक उसने राष्ट्र और महाराष्ट्र की अस्मिता के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले महाराष्ट्र में की है। महाराष्ट्र के सम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए की है। यह अब जगजाहिर हो गया है। इसीलिए ‘कमल’ के इस कुचक्र का आम (सच्चे) शिवसैनिकों में जितना विरोध हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा रोष आम (जन) मानस में देखने को मिल रहा है और जनता जब एक बार ठान लेती है तो वह बदलाव करके ही दम लेती है। देशभर से शिवसेना और पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे, युवासेनाप्रमुख आदित्य ठाकरे को मिल रहे प्रतिसाद से इस पर सच्चाई की मोहर भी लग गई है। नि:संदेह यह भाजपाइयों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है।
कुल मिलाकर, अमृत महोत्सव के इस वर्ष में जहरीले मंसूबों की यह भाजपाई ‘डोज’, न केवल इस देश की जनता को नामंजूर है, बल्कि यह महाराष्ट्र के आम जनमानस को भी मंजूर नहीं है। इसीलिए महाराष्ट्र में हिंदू, मुस्लिम-सिख-ईसाई, सवर्ण-दलित, ओबीसी-एसटी, सभी वर्ग के लोग ‘मातोश्री’ पर पहुंच रहे हैं। शिवसेना भवन में भीड़ लगा रहे हैं। यह ये दर्शाने के लिए काफी है कि सत्ता खींचने का भाजपा का दांव उल्टा पड़ गया है। राजनैतिक ‘आपातकाल’ में ‘अंगद’ का पांव नड़ गया है।

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