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बेबाक: पाकिस्तानी सियासत की ओर हिंदुस्थान की राजनीति! विरोधियों से द्वेष और एजेंसियों का दुरुपयोग है नई भाजपा का नया सिद्धांत

  • अनिल तिवारी

कोई अगर यह कहे कि देश में भारतीय जनता पार्टी का नैतिक अंत २०१४ में ही हो गया था और उसके बाद वजूद में आई `नई भाजपा’ ने पाकिस्तान के सियासी मॉडल को अख्तियार कर लिया था, तो शायद गलत नहीं होगा। भाजपा और भाजपा प्रणित केंद्र सरकार के गत ८ वर्षों के कार्यकाल और कार्य-कलापों पर नजर दौड़ाई जाए तो इस बात की पुष्टि भी हो जाती है। २०१४ के बाद वजूद में आई नई भाजपा, देश के केंद्र दिल्ली से लेकर तमाम शहरों की `गल्ली’ तक, अपने किसी भी राजनीतिक विरोधी को बख्शना नहीं चाहती है। वह नफरत की पराकाष्ठा तक, उनसे राजनीतिक बदला लेना चाहती है और इसके लिए वह किसी भी हद तक केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करने से हिचकिचाती नहीं।
वर्ष २०१४ में देश ने एक बड़े राजनीतिक बदलाव की उम्मीद की थी। लोगों को अपेक्षा थी कि दशकों तक केंद्र का पर्याय बनी रही कांग्रेस के इतर, एक बार भारतीय जनता पार्टी को भी आजमाना चाहिए। खुद भाजपा ने भी इसके लिए जोरदार ढंग से तैयारियां कर रखी थीं। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा था। यहां मोदी जी का खेमा भी पूरे देश को यह समझाने का प्रयास कर रहा था कि किस तरह मोदी जी ने, बतौर मुख्यमंत्री १२ वर्षों में गुजरात को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया है। उनका गुजरात किस कदर एक पिछड़े राज्य से अगड़े राज्य के तौर पर पहचाना जाने लगा है। यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो गुजरात का यह `विकास मॉडल’ पूरे देश में लागू होगा और फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब हिंदुस्थान का नाम, न केवल एशिया में, बल्कि पूरी दुनिया में चमक उठेगा। यहां के हालात पूरी तरह से बदल जाएंगे। कोई युवा बेरोजगार नहीं होगा। सामाजिक समरसता होगी। अपराध पर नियंत्रण होगा। कोई धार्मिक टकराव नहीं होगा। कट्टरवाद को काबू कर लिया जाएगा। हिंदुस्थान के शहर शंघाई, टोक्यो और न जाने विश्व विख्यात किन-किन शहरों की तरह तब्दील हो चुके होंगे। शिक्षा की गुणवत्ता में बेतहाशा सुधार हो चुका होगा। महंगाई का नामोनिशान नहीं होगा और सारी दुनिया हर चीज के लिए हिंदुस्थान की ओर नजरें गड़ाए बैठी होगी। वगैरह-वगैरह…। उस वक्त शायद कोई नहीं जानता था कि दरअसल गुजरात के विकास मॉडल का अर्थ यह सब कुछ नहीं है, बल्कि गुजरात का विकास मॉडल, मतलब पहले अपनी ही पार्टी के भीतर के विरोधियों का राजनीतिक खात्मा कर खुद का विकास करना था। उसके बाद, प्रदेश के अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को तोड़कर या जोड़कर उनका वजूद मिटाना विकास का दूसरा पायदान था। गुजरात में शंकर सिंह वाघेला हो या केशुभाई पटेल या फिर कोई और, गुजरात मॉडल में सभी का यही हश्र हुआ है।
आज इसी मॉडल को देशभर में लागू होते देखा जा सकता है। आज देश के हर एक प्रदेश में भाजपा से भिन्न विचारधारा रखनेवाले राजनीतिक दल को येन-केन-प्रकारेण खत्म किया जा रहा है। उनके नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में काम करने को मजबूर किया जा रहा है। उन पर बेवजह भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। गैर भाजपाई राज्य सरकारों को अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया जा रहा है। देश में राजनीतिक वैमनस्य इस कदर बढ़ाया जा रहा है कि वह जनता के लिए जहर बन जाए। केंद्रीय एजेंसियों को बेपनाह अधिकार दिए जा रहे हैं, ताकि वह विपक्ष पर दमनचक्र चला सकें। यदि यह सब कुछ हिंदुस्थान जैसे देश में हो रहा है तो फिर कोई यह कहे कि हम पाकिस्तान के साथ सियासी बराबरी कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? पाकिस्तान में भी तो सत्ता से पदच्युत होते ही, वहां के नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों के, आईएसआई के और सरकार के कानूनी फंदे कस दिए जाते हैं। विपक्षी नेताओं पर मृत्युदंड तक का खतरा मंडराने लगता है। उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी आने लगती है। इमरान खान इसका ताजा उदाहरण हैं। दरअसल, वहां का सिस्टम इतना क्रूर है कि वह राजनीतिक दलों और सरकारों को अपनी उंगलियों पर नाचते देखना चाहता है और जो यह नाच नहीं करना चाहता, उसका सर्वनाश तय हो जाता है।
यही वजह है कि बंटवारे के ७५ वर्षों बाद भी आज तक पाकिस्तान में किसी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। अब यहां हिंदुस्थान में भी यही प्रयोग गैर भाजपाई राज्य सरकारों के साथ किया जा रहा है। किसी को भी उनका कार्यकाल पूरा होने का भरोसा नहीं है। विधायकों को तोड़ा जा रहा है, खरीदा जा रहा है, डराया और धमकाया जा रहा है। एक स्वस्थ प्रजातंत्र को पंगु बनाया जा रहा है। समाज में कड़वाहट के बीज बोकर वोट बैंक बनाया जा रहा है। सियासत का अर्थ अब हिंदुस्थान में भी साम-दाम-दंड-भेद का पर्याय बन चुका है। अंग्रेज भी शरमा जाएं, उस स्तर की भेदभाव और दमनकारी नीति अपनाई जा रही है। केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग इस हद तक हो रहा है कि सियासत के मायने ही द्वेष बनकर रह गए हैं। राजनीति में आज हर व्यक्ति डरा हुआ है, चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का। यह डर शायद बुद्धिजीवियों को भी सता रहा होगा, उनके समक्ष भी एक प्रश्न होगा कि हिंदुस्थान का राजनीतिक भविष्य क्या है? इसे समय रहते काबू में करने की जरूरत है प्रधानमंत्री जी!

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