मुख्यपृष्ठनए समाचारबेबाक : बरगलाओ और बेचो! ...यह नीति देश के लिए घातक

बेबाक : बरगलाओ और बेचो! …यह नीति देश के लिए घातक

अनिल तिवारी
भारतीय रेलवे की परिचालन सेवा सुधारने व रेलवे के विभिन्न विभागीय मंडलों की कार्यक्षमता उन्नत करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार नित नए फैसले ले रही है। यह दर्शाने का पुरजोर प्रयत्न किया जा रहा है कि कुछ ट्रेनों की शक्ल बदलकर या कुछ ढांचागत हेर-फेर करके भारतीय रेलवे को दुनिया की अत्याधुनिक रेल प्रणालियों के समकक्ष लाने का स्वप्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से पूर्ण करने का, रेलवे मंत्री व मंत्रालय अथक परिश्रम कर रहे हैं। कार्यक्षमता बढ़ाने और ढांचागत व्यवस्था सुधारने की इसी कड़ी में अब खबर है कि भारतीय रेलवे अपनी आठ उत्पादन इकाइयों को मिलाकर एक पीएसयू बनाने जा रही है, जिनमें रेलवे के रोलिंग स्टॉक से लेकर विभिन्न प्रकार के लोकोमोटिव्स का निर्माण होता है। सरकार भले ही इसके पीछे रेलवे के ढांचागत सुधार का हवाला दे रही हो, पर रोलिंग स्टॉक और लोकोमोटिव को लेकर होनेवाले इस संभावित फैसले के पीछे का ‘मोटिव’ समझना भी बेहद जरूरी है।
आपको याद होगा कि केंद्र सरकार ने गत वर्ष १६ जून को भारतीय सुरक्षा प्रणाली की चौथी बाजू कहे जानेवाले आयुध कारखानों को ७ कंपनियों में विभाजित कर दिया था। इसे सुधार प्रक्रिया का नाम देकर केंद्र ने भले ही अपने मंसूबे उजागर न होने दिए हों, तब भी जानकारों ने सरकार के इस कदम को इंडियन डिफेंस के रणनीतिक कौशल और प्रबंधन से खिलवाड़ बताया था। चूंकि सरकार का यह कदम साफतौर पर एक पीएसयू को तोड़कर ७ कंपनियां बनाकर उन्हें निजीकरण की दिशा में ले जानेवाला प्रतीत हो रहा था, इसलिए इसका विरोध स्वाभाविक भी है। जिन आयुध कारखानों ने देश के हर युद्ध में मूल्यवान सहयोग दिया हो, विदेशी हथियार निर्माताओं की घुसपैठ को सीमित रखा हो, उन्हें लेकर सरकार का यह फैसला उसी वक्त से शक के घेरे में था। तमाम ट्रेड यूनियन्स इसका शुरुआत से विरोध करती आ रही हैं और लगातार मांग कर रही हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के निजीकरण की नीति पर मोदी सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। उनका तर्क है कि किसी पीएसयू को ‘कोर और नॉन कोर’ क्षेत्रों में बांटने और रक्षा और रेलवे प्रतिष्ठानों का कॉर्पोरेटीकरण करने जैसे उपाय असंतुलित नीतियां हैं। क्योंकि अधिकांश निजी कॉर्पोरेट प्रबंधन केवल अपने व्यवसाय का विस्तार करने और लाभ कमाने में रुचि रखते हैं, उनकी प्रतिक्रियाएं अलग होती हैं। संक्षेप में कहें तो देश में आयुध कारखानों व रेलवे की उत्पादन इकाइयों की कल तक प्राथमिकताएं अलग रही हैं, जो आनेवाले दिनों में यदि कॉर्पोराइट कर दी गर्इं, उनका निजीकरण कर दिया गया तो अलग हो जाएंगी।
अर्थात यदि कल को सरकार भारतीय रेलवे की आठों उत्पादन इकाइयों को रेलवे से अलग करके एक पीएसयू बनाती है, फिर आगे चलकर उस पीएसयू को आयुध कारखाने की तर्ज पर खत्म करके उन इकाइयों को स्वतंत्र कर देती है, तब उनके निजीकरण की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। दोनों ही मामलों में, चाहे वह आयुध कारखानों का मामला हो या फिर रेलवे की उत्पादन इकाइयों का, उनकी अब तक प्राथमिकता मुनाफा कमाना नहीं रही हैं। यदि इनका निजीकरण हो जाता है और दुर्भाग्य से इनका स्वामित्व या प्रबंधन विदेशी हाथों या कॉर्पोरेट्स के पास चला जाता है तो देश के सामने भविष्य में विकट परिस्थिति खड़ी हो सकती है। क्योंकि एक ओर मसला देश की सुरक्षा से जुड़ा है तो दूसरी ओर देश के ‘नेशनल कैरियर’ यानी विकास की धमनी से।
इसे देश की सुधारात्मक प्रक्रिया कहें या दुर्भाग्यपूर्ण नीति, यह तो समय ही बताएगा, परंतु यदि केंद्र सरकार यह मानती है कि सरकारी उपक्रमों या इकाइयों का प्रदर्शन सुधारने या उनकी संपूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए उनका प्राइवेटाइजेशन, कॉर्पोराइजेशन या डिसइन्वेंटमेंट करना ही एकमात्र रास्ता है तो वह संभवत: गलत सोच से ग्रसित है।
देश की नवरतन कंपनियों समेत एलआईसी, ओएनजीसी, आईडीबीआई बैंक, कॉनकोर, शिपिंग कॉर्पोरेशन, हिंदुस्थान जिंक और एचजेएल को बेच देने से नीतिगत या ढांचागत सुधार नहीं होंगे। इससे क्षणिक लाभ तो मिल सकता है पर ये भविष्य की राह मुश्किल करेंगे, यह तय है। खासकर रेलवे, रक्षा और ऊर्जा से जुड़े मुनाफे और महत्व वाले उपक्रमों, निगमों या इकाइयों को लेकर तो ऐसा कदापि नहीं किया जा सकता। हालिया खबरें इस बात की पुष्टि करती हैं कि मुनाफे के उपक्रमों पर विदेशियों की नजर गिद्धों के समान लगी हैं।
भारतीय रेलवे के कंटेनर
कॉर्पोरेशन यानी ‘कॉनकोर’ को बेचने की अभी बात शुरू ही हुई थी कि विश्व की सबसे बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनी और वेसेल ऑपरेटर मर्क ने उसमें हिस्सेदारी खरीदने की दिलचस्पी भी दिखा दी। मर्क के अलावा कॉनकोर में दिलचस्पी जेएसडब्ल्यू ग्रुप और एस्सार पोर्ट्स को भी है। केंद्र सरकार ने २०१९ में जब कॉनकोर की ३०.८ प्रतिशत हिस्सेदारी निजी कंपनियों को बेचने की अनुमति दी थी, तबसे उक्त तीनों कंपनियों के अलावा स्क्वार्ड कैपिटल, सोजित्स कॉर्पोरेशन, अदाणी समूह, डीपी वर्ल्ड और पीएसए सिंगापुर इसमें रुचि ले चुके हैं। खैर…
कुल मिलाकर, रेलवे की ८ उत्पादन इकाइयों को भारतीय रेलवे से अलग करके ‘इंडियन रेलवे रोलिंग स्टॉक कंपनी’ (आईआरआरएससी) बनाए जाने का संभावित पैâसला भी एक दिन निजीकरण के दरवाजे पर दस्तक देता नजर आए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि केंद्र की मौजूदा सरकार का मंत्री ही कॉर्पोर्टाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और डिसइन्वेस्टमेंट पर टिका है। ‘बरगलाओ और बेचो’ की यह नीति एक दिन इस देश की सुरक्षा, संरक्षा और सुधार की कमर तोड़ने के लिए काफी होगी।

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