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बेबाक : झंडा ऊंचा रहे हमारा ‘हर घर रोजगार’ कब?

  •  अनिल तिवारी

देश इन दिनों स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है। देशवासियों को इस उपलब्धि का एहसास कराया जा रहा है। आजादी के ७५ वर्षों का लेखा-जोखा दिखाया जा रहा है। तमाम विश्लेषक इस पर अपने-अपने मत भी व्यक्त कर रहे हैं। राज्य सरकारें १५ अगस्त, यानी स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में जुटी हैं। तो केंद्र सरकार पूरे देश में ‘अमृतमय’ वातावरण बनाने के लिए जोर-शोर से ‘हर घर तिरंगा’ योजना पर काम कर रही है। ‘हर घर तिरंगा’ मतलब इस स्वतंत्रता दिवस पर सभी हिंदुस्थानियों से अपने-अपने घरों में तिरंगा फहराने, आजादी का जश्न मनाने की अपील है, ताकि देश में राष्ट्रभक्ति की बयार और सामाजिक समरसता की फुहार का माहौल दिखाया जा सके। निश्चित तौर पर देशवासियों को ऐसा करना चाहिए और वे करेंगे भी। पर क्या ऐसा करने मात्र से देश में सामाजिक समरसता बलशाली हो जाएगी? देश की समस्याएं हल हो जाएंगी? महंगाई, बेरोजगारी, धार्मिक कट्टरवाद, संगठित अपराध, महिला सुरक्षा और सबसे अहम राजनीतिक द्वेष की भावना खत्म हो जाएगी क्या? राजनीतिक दबंगई से सत्ताधारी कार्यकर्ता पीछे हट जाएंगे क्या? तो जवाब है, शायद नहीं। इसलिए यहां महत्वपूर्ण यह है कि ‘हर घर तिरंगा’ से अहम देश के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर गौर करना सरकार की प्राथमिकता में कब शुमार होगा? तेजी से बढ़ती महंगाई और उतनी ही तेजी से घटते रोजगारों का मसला कब हल होगा?
पहले रिफॉम्र्स, फिर नोटबंदी, फिर एकीकृत कर प्रणाली (जीएसटी) और उसके बाद कोरोना की मार ने इस देश के आम नागरिक की कमर पहले ही तोड़ रखी थी। उस पर केंद्र सरकार की आए दिन सख्त होती आर्थिक नीतियों और रोज बढ़ते करों के बोझ, पेट्रोल-डीजल-गैस के महंगे होते दामों ने गरीब को और गरीब, तो अमीर को और अमीर बना दिया है। यह आर्थिक ज्यादती भी देशवासी सह लेता, यदि आज ‘हर घर रोजगार’ जैसी कोई योजना अमल में आ चुकी होती। तब उससे हर बार भावनात्मक अपील न करनी पड़ती। अफसोस, पिछले ८ वर्षों में ऐसा हो न सका। रोजगार बढ़ने की बजाय देश में तेजी से रोजगार घटते चले गए। आज हालात ये हैं कि दुनिया के तमाम देशों में रोजगार के मामले में हमारी स्थिति बेहद खराब है। ‘नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस’ (एनएसएसओ) देश में नौकरियों के आंकड़ों को लेकर लगातार चेताता रहा है। मोदी सरकार के पहले टर्म के खत्म होते ही आई उनकी रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में बेरोजगारी ४५ वर्षों के उच्चतम स्तर पर है। देश की वर्किंग आबादी में आधों के पास काम नहीं है। २०१७ की एक तिमाही में ८७ हजार नौकरियां खत्म होने की बात श्रम ब्यूरो के सर्वे में सामने आई थी। तब एमएसएमई मंत्रालय ने माना था कि कर्ज योजनाओं के अंतर्गत रोजगार और लाभ में २०१४ से कमी आई है और सरकार के ही आंकड़ों ने ही मान्य किया था कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में रोजगार तेजी से कम हुए थे। वो भी तब जब २०१४ के घोषणा पत्र में, जनसभाओं में और यहां तक कि साक्षात्कारों में खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने करोड़ों रोजगार देने का वादा किया था। दरअसल, देश में जब भी जरूरत के मुद्दों पर बहस छिड़ी है तो केंद्र ने जनता के पैरों में किसी-न-किसी ‘भावना’ की जंजीर डाली है या प्रतीकों की राजनीति का पांसा फेंका  है। अपने पहले ५ साल के कार्यकाल में केंद्र सरकार ने कभी भी परिवर्तन के मुद्दों पर गंभीरता से काम नहीं किया। उसकी रोजगार बढ़ानेवाली तमाम योजनाएं विफल साबित हुईं। २०१६ में नोटबंदी का कदम उठाकर तो सरकार ने असंगठित क्षेत्रों के लाखों-करोड़ों लोगों को या तो बेरोजगार कर दिया या उनकी आर्थिक स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया।
२०१६ में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार को साफ शब्दों में चेताते हुए कहा भी था कि ‘बिना सोचे-विचारे लिए गए नोटबंदी के फैसले के चलते बेरोजगारी चरम पर है और अनौपचारिक क्षेत्र खस्ताहाल है।’ उनकी चेतावनी के साल-डेढ़ साल बाद ही केवल स्मॉल, माइक्रो और मीडियम सेक्टर से ३० से ४० लाख नौकरियां कम होने की रिपोर्ट आने लगी थीं। जो यह साबित करने के लिए काफी था कि नोटबंदी का फैसला देश की आर्थिक संप्रभुता पर हमला साबित हुआ है। इसी तरह आनन-फानन में लिए कुछ अन्य फैसलों से भी सरकार ने देश में बेरोजगारी बढ़ाने का ही काम किया और जब उस पर सवाल उठा तो मामले पर मिट्टी डालने के लिए मुद्रा लोन और स्वरोजगार के आभासी आंकड़े पेश कर दिए गए। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की रिपोट्र्स के अनुसार २०१३-१४ से देश में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, जो २०१८ तक दो करोड़ तक पहुंच चुकी थी। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध शोध परिषद के एक अध्ययन के अनुसार स्वरोजगार करनेवाले लोग किसी भी प्रकार का रोजगार निर्मित नहीं कर पाए क्योंकि इनमें अधिकांश की खुद की आय मासिक १० हजार से कम पाई गई है। उसी तरह मुद्रा लोन से रोजगारों में कोई इजाफा नहीं हुआ है, खुद केंद्र  सरकार के आंकड़े समय-समय पर यह साबित भी कर चुके हैं। सरकार के पहले टर्म के दौरान ही मुद्रा लोन का डूबा कर्ज ७ हजार २०० करोड़ रुपए तक पहुंच गया था।
सरकार के दूसरे कार्यकाल की तस्वीर भी इससे जुदा नहीं है। २०१९ के बाद भी देश में लगातार रोजगार कम हुए क्योंकि सरकार ने हर बार परिवर्तन पर प्रतीकों की सियासत को ज्यादा तवज्जो दी और जब इस पर विवाद बढ़ने लगा तो फेस  सेविंग के लिए अभी दो माह पहले प्रधानमंत्री ने अपने तमाम मंत्रालयों को डेढ़ वर्ष के भीतर १० लाख खाली पड़े पदों को भरने के लिए कह दिया। यदि मान भी लिया जाए कि आगामी डेढ़ वर्षों में १० लाख लोगों को नौकरियां मिल भी जाएंगी तो क्या देश में बेरोजगारी का प्रश्न हल हो जाएगा। जहां करोड़ों रोजगार की जरूरत हो, वहां मुट्ठी भर लोगों को नौकरियां देने से समस्या हल हो जाएगी? और जब सभी को रोजगार नहीं मिलेगा तो केवल सामाजिक त्याग और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के नाम पर देश का आम गरीब व मध्यमवर्गीय कब तक सियासी भावनाओं में बह पाएगा? प्रतीकों की राजनीति में सियासत का मोहरा बनने को क्यों तैयार होगा? वो क्यों न अपनी जरूरतों के रास्ते पाने की मांग बुलंद करेगा? सेंटर फॉर इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट जब बताती हो कि देश में मात्र एक माह के भीतर ग्रामीण इलाकों में १३ लाख लोगों की नौकरियां चली गई हों तो वहां का नागरिक पकौड़ा बनाने को कैसे रोजगार मान लेगा? वो कब तक असंगठित क्षेत्र के छोटे-मोटे रोजगारों से जीवन काटेगा। आज देश में चौतरफा असंतोष का सबसे बड़ा कारण यही है, अपर्याप्त रोजगारों का होना। सरकारी क्षेत्र में नौकरियां हैं नहीं, और निजी क्षेत्र को सरकारी नीतियों ने रोजगार बढ़ाने लायक छोड़ा नहीं है। ऐसे में लोगों को कभी आरक्षण, तो कभी सरकारी नौकरी ही रोजगार का जरिया नजर आती है। बेरोजगार चाहता है कि देश में इन मुद्दों पर चर्चा हो और उन्हें हल करने के लिए तेजी से काम भी हो, परंतु देश का सियासी वर्ग हो या बुद्धिजीवी वर्ग, देश के हर ज्वलंत मुद्दे पर वो ट्विटर पर जोरदार चर्चा करता है, टीवी पर डिबेट करता है, कहीं कोई मोर्चा निकलता है, तो कुछ छोटे-मोटे आंदोलन भी होते हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि देश में महंगाई का मुद्दा हो या रोजगार का सवाल, नागरिकों के हित में कुछ नहीं हो पाता। वो सरकारी अपील के नाते ‘अग्निवीर’ बनकर ‘अग्निपथ’ पर चलता रहता है और अंत में उसे मिलता है तो केवल भावनाओं का झुनझुना। कोविड में थाली बजाने या दीया जलाने, कभी सब्सिडी छोड़ने या कुछ और त्याग करने के अलावा उसके बस में कुछ नहीं होता। इस बार भी ‘हर घर तिरंगा’ फहराकर ‘हर घर रोजगार’ का इंतजार करने के अलावा उसके नसीब में कुछ नहीं होगा। उसे केसरिया दाल, सफेद चावल और हरी सब्जियों का ‘हर घर तिरंगा’ कब नसीब होगा?

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