मुख्यपृष्ठस्तंभबनना मेरे मकान का हेरिटेज!

बनना मेरे मकान का हेरिटेज!

डॉ. रवींद्र कुमार

यह सुनकर दिल गद्‌गद्‌ हुआ कि सरकार ने उपन्यास सम्राट के मकान को सरकारी स्मारक घोषित कर दिया है। अब मैं चैन से मर सकूंगा। मैं बेकार ही सोच-सोचकर परेशान था कि जीते जी सरकार ने मेरी सुधि नहीं ली कि इस विशाल और महान देश के छोटे से कोने में एक महान लेखक पड़े-पड़े सड़ रहा है और कागज काले कर रहा है, लेकिन अब फिकर नहीं। अब ये तय है कि जीते जी न सही, मरने के सौ दो सौ साल बाद तो मेरी भी कद्र होनी है। बस सौ दो सौ साल की ही तो बात है। मुझे भी कहां जल्दी है।

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि उपन्यास सम्राट तो गांव में रहते थे। वहां एक अदद मकान उन्हें नसीब था, मगर मैं तो शहर में रहता हूं। वो भी मुंबई में। अब इस महानगर में मेरी `खोली’ ढूंढ़ने में स्मारक समिति वालों को इतने पापड़ बेलने पड़ेंगे कि वो अपने मकान का पता भूल जाएंगे। मेरे मरने के बाद सेठ को दूसरा किराएदार मुश्किल से मिल पाएगा। मुंबई में पगड़ी बहुत है और पगड़ी के पैसे देते-देते आदमी के बाकी कपड़े उतरने की नौबत आ जाती है।
हो सकता है आज जहां मेरी `चाल’ है, वहां कोई मल्टीप्लैक्स या शॉपिंग मॉल बन जाए। तब क्या होगा? मैं सोच-सोच कर परेशान हूं। मेरी खोली बनी रही तो मैं चाहूंगा अगल-बगल की दस-पांच खोलियां भी खाली करा ली जाएं। क्योंकि एक तो इससे मुझे पड़ोसियों से बदला लेने का मौका मिलेगा, जिन्होंने हमेशा मेरी खाट खड़ी कर रखी थी। दूसरे, जीते जी मैं चाहे जैसे रहा हूं स्मारक से तो लगे कि अगला भी समृद्ध लेखक था और भव्य मकान में रहता था। मैं नहीं चाहता कि लोगों को पता चले कि इस लेखक का राशन उधार आता था और वह प्रकाशकों के दफ्तर-दफ्तर चप्पल फटकारता घूमता था।

वैसे मेरे मकान में खूबियां भी बहुत हैं। ये यों भी म्यूजियम में रखे जाने लायक हैं। बारिश में बारिश का आनंद मकान के अंदर ही मिल जाता है। पूरी वातानुकूलित खोली है। सर्दियों में गर्म, क्योंकि ठंडी हवा आने जाने का कोई साधन नहीं है। बच्चू कहीं से मेरा घर तो दूर, मेरी गली में नहीं घुस सकती है। गर्मियों में हम बाहर छत पे सोते हैं। कमरे में सोएंगे तो निश्चिंत ही सुबह तक मरे पाए जाएंगे। कारण कि बिजली विभाग हम पर सदैव कृपालु रहता है। बहुधा स्मारकों में आपने ऐसे खोजी लोगों को देखा होगा, जो पुरातत्वविदों की सी बेचैनी चेहरे पर लिए टॉयलेट ढूंढ़ते फिरते हैं। वहां आपको फकीरों, बादशाहों की रूह मिलना आसान है, मगर टॉयलेट ढूंढ़ने से नहीं मिल सकेगा, क्योंकि टॉयलेट सरकारी लोग बनाते हैं। अत: वह उसे उतना ही जटिल बना देते हैं, जितने कि उनके दफ्तर की विभिन्न प्रक्रियाएं होती हैं। एक दफ्तर में तो टॉयलेट में ताला लगा रहता था और उसकी चाबियां कुछ गिनी-चुनी वी.आई.पी. किस्म की महिलाएं हथियाई हुई थींr। वे टॉयलेट की तिजोरी जैसी सुरक्षा करती थीं। बिना चाबी वहां चिड़िया भी पर नहीं मार सकती थी। चिड़े को तो चाबी मिलनी ही नहीं थी (लेडीज टॉयलेट जो था)। दूसरी बात ये कि स्मारकों में साफ-सफाई, पुताई-धुलाई को लेकर बहुत मचमच रहती है। पूछो तो वही फंड का रोना। एक बात यह है कि सरकार इस स्मारक के लिए अगर टिकट लगाएगी तो देखने कौन आएगा? ये कोई डांस-बार तो है नहीं कि अंदर जाकर किसी तंग गली में हो तो भी लोग छुपते-छुपाते बिना किसी विज्ञापन के बड़ी तादाद में आ जाते हैं।

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