मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाभोजपुरिया व्यंग्य : पुरान कपड़ा जइसन दल बदलेला

भोजपुरिया व्यंग्य : पुरान कपड़ा जइसन दल बदलेला

प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही

हमनी के नेताजी हमनी के आदर्श हवें। ‘चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि गड़ गये कोटि दृग उसी ओर’ जइसन हउवें। हालांकि, ई सब उनका खातिर उपयुक्त लाइन नइखे, बाकि संदर्भ के हिसाब से लिखे के पड़ेला। एह लोग के चलते लोकतंत्र सुरक्षित बा। आ इ लोगन लोकतंत्र में सुरक्षित बा। हमरा समझ मा नइखे आवत। अगर हमनी के अइसन कुछ करब त उ लोकतांत्रिक मूल्य के खिलाफ होई। नेताजी के धर्मनिरपेक्ष नीति के बड़ झटका लागी। बदलाव के ई अभियान कवनो हालत में स्थापित रहे के चाहीं। राउर साँच बोलिला त हमनी के नेताजी अउर ओनकर दलबदल इहे लोकतंत्र के आत्मा ह अवुरी राजनेता एकर खंभा हयन।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहले बानि ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।’ मतलब कि आत्मा अमर बा। उ कबो ना मरेली। जइसे आदमी पुरान कपड़ा छोड़ के नया कपड़ा पहिरेला, ओसहीं आत्मा एगो नश्वर शरीर से निकल के दोसरा शरीर में प्रवेश करेला। इ सिद्धांत हमनी के राजनीति अवुरी राजनेता प भी ओतने लागू बा। अगर रउरा ई बात ना बुझाइल त हम रउरा के साधारण भाषा में समझा देब।
रउरा राजनेता के ‘आत्मा’ आ पार्टी के ‘शरीर’ मान सकेनी। काहे कि भगवान श्रीकृष्ण खुद गीता में कहले बाड़न कि ‘आत्मा नश्वर ह’ माने कि ऊ कबो ना मरेला। उ त बस देह के त्याग करेली। एही तरे राजनीति में कवनो राजनेता जब चुनाव के मौसम में कवनो पार्टी यानी ‘शरीर’ छोड़ के दोसरा पार्टी यानी ‘शरीर’ में घुस जाला त ओकरा के आत्मा के त्याग कहल जाला। वइसे भी इहाँ परकाया प्रवेश के ज्ञान बहुत प्राचीन रहे, लेकिन उ विलुप्त हो गईल रहे। आधुनिक लोकतंत्र में एह सीख के जिंदा राखे खातिर हमनी के राजनेता बहुते बलिदान देले बाड़े। लोकतंत्र में नेताजी के दलबदल शिक्षा के जिंदा करे खातिर हमनी के समाज आजीवन राजनीति आ राजनेता के ऋणी बनल रही। बेचारे नेताजी सैकड़ों चूहा निगल के परम संत बनतारे। ऊ कलयुग के देवता हउवें। ऊ परम कल्याण खातिर व्रत लेला, बाकि ऊ आपन कल्याण खुदे करेला।

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