मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य : रउरा चला चली टाँग खींचल जाव

भोजपुरिया व्यंग्य : रउरा चला चली टाँग खींचल जाव

प्रभुनाथ शुक्ल भदोही

टाँग यानी गोड़ के का कहल जाव। अइसन नइखे मलिकार। गोड़ के आपन महत्व होला। लोग गोड़ धकेले के साथे गोड़ खींच भी लेला। अइसन लोग आपन दिन के शुरुआत गोड़ खींचला जइसन कुलीन काम से शुरू करेला। रात में सुतत घरी पूरा योजना तइयार कर लेत बाड़े। जइसे कि केकर गोड़ सबेरे खींचे के बा। कब, काहे आ केकरा खातिर। ई काम योजनाबद्ध तरीका से कइल जाला। अगर इ जिम्मेवारी नीती आयोग के दिहल जाई त उहो हाथ उठाई देई।
हमनी के देश में सत्ता, विपक्ष के गोड़ खींचता अवुरी विपक्ष सत्ता के गोड़ खींचता। जइसे कि दुनु जने के लड़ल जन्मजात अधिकार बन गइल बा। सबके काम बस गोड़ लटकावे के बा। अब दू गो गोड़ के लड़ाई में बेचारी मासूम जनता-जनार्दन कुचलल जा रहल बा। काहे कि ओकरा गोड़ खींचल के आदत नइखे हव।
ससुरी एह लड़ाई में गोड़ के हालत खराब हो जाला। एकर सबसे रोचक मस्ती चुनाव में देखे के मिलेला। बेचारा गोड़ के कुछ दिन तक आराम ना मिलेला। सत्ताधारी दल विपक्ष के गोड़ से परेशान बा। काहे कि सत्ताधारी दल के गोड़ से विपक्ष के ईर्ष्या होला। ऊ लोग चाहत बा कि जब चुनाव में झुग्गी-झोपड़ी, गली-चौराहा में विपक्ष के गोड़ मार्च करत बा त फेर सत्ता यानी सरकार के गोड़ काहे आराम करी। एही से विपक्ष सत्ताधारी दल के गोड़ अडावई क उपलब्धि जनता में गिनावत रहेला।
जइसे राजनीति में गोड़ खींचल जन्मजात अधिकार ह। कबो-कबो गोड़ अइसन खींचा जाला कि फेर से खींचला के लायक भी ना होखे। गोड़ खींचला के निरंकुशता राजनीति आ हमनी के समाज में तेजी से विस्तार हो रहल बा। गोड़ खींचल एगो आम प्रथा बन गइल बा। हालांकि, ई कब, कहाँ आ कइसे शुरू भइल ई शोध के बात बा। सत्ता के गोड़ पर कुछ दया करीं। पता ना कब ऊंट कब पलटी मार जाय अऊर सत्ता क गोड़ यानी टाँग तोहार बैसाखी बन जाई। फिलहाल, रउरा लड़ि, लड़ाई अवुरी खूब टाँग अड़ार्इं। बाकि सावधान रहीं।

अन्य समाचार