मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाटीबी मुक्त हिंदुस्थान बनाना बड़ी चुनौती

टीबी मुक्त हिंदुस्थान बनाना बड़ी चुनौती

योगेश कुमार गोयल। टीबी ट्यूबरकुल बेसिलाइ, जिसे क्षय रोग, तपेदिक अथवा राजरोग के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी संक्रामक बीमारी है, जो माइको ट्यूबरक्युलोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। वैसे तो टीबी बाल और नाखूनों को छोड़कर शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है लेकिन इसका ज्यादातर असर फेफड़ों पर ही होता है। टीबी से पीड़ित व्यक्ति के खांसने-छींकने के दौरान मुंह व नाक से निकलने वाली ड्रॉपलेट्स के जरिए कोई स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमित हो सकता है। ड्रॉपलेट्स के जरिए पैâलने वाले बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक केवल फेफड़ों की टीबी ही संक्रामक होती है, शरीर के अन्य हिस्सों में यह संक्रामक नहीं होती। दरअसल फेफड़ों के अलावा टीबी मुंह, लिवर, गले, दिमाग, किडनी, रीढ़ तथा यूट्रस में भी हो सकती है किंतु ऐसी टीबी मरीज से दूसरे व्यक्ति में नहीं पैâलती। इस बीमारी को खतरनाक इसलिए माना जाता है, क्योंकि यह शरीर के जिस हिस्से में होती है, धीरे-धीरे उस हिस्से को बेकार करना शुरू कर देती है।
इस वैश्विक महामारी के जानलेवा परिणामों के प्रति लोगों को जागरूक करने तथा इसे जड़ से खत्म करने के प्रयास तेज करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष २४ मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है और डबल्यूएचओ के तत्वावधान में विश्वभर में टीबी से संबंधित कई कार्यक्रम चलाए जाते हैं। २४ मार्च १८८२ को एक जर्मन चिकित्सक और माइक्रोबायोलॉजिस्ट डा. रॉबर्ट कोच ने इस जानलेवा बीमारी के कारक बैक्टीरिया की पहचान करने की पुष्टि की थी, जिसके फलस्वरूप टीबी के निदान और इलाज में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बड़ी मदद मिली। प्रतिवर्ष विश्व टीबी दिवस एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है और २०२२ की थीम है ‘टीबी को खत्म करने के लिए निवेश करें, जीवन बचाएं।’ टीबी दिवस २०२१ की थीम थी ‘घड़ी चल रही है’ जबकि २०२० की थीम थी ‘यह टीबी खत्म करने का समय है।’ वैश्विक टीबी रिपोर्ट २०२० के आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्वभर में टीबी से बीमार होने वाले लोगों की संख्या करीब एक करोड़ थी, जबकि लगभग १५ लाख लोगों की मौत टीबी से हुई। हिंदुस्थान टीबी से सर्वाधिक प्रभावित एशियाई देश है। इस रिपोर्ट के अनुसार २०२० में भारत में टीबी के कुल २६.४ लाख मरीज थे और वर्ष २०१९ में टीबी विकसित करने वाले देशों में भारत की २६ फीसदी हिस्सेदारी थी।
टीबी का खात्मा करने की रणनीति के तहत डब्ल्यूएचओ २०३५ तक टीबी से होने वाली मौतों को ९५ फीसदी तक और टीबी के नए मामलों को ९० फीसदी तक कम करने पर काम कर रहा है। विश्व को टीबी मुक्त करने की डब्ल्यूएचओ की रणनीति के तहत टीबी रोगियों के लिए विशेष देखभाल केंद्रों की स्थापना, सभी देशों द्वारा टीबी को लेकर सार्थक कदम उठाने और टीबी को खत्म करने वाली प्रणालियों पर कार्य करने की अनिवार्यता तथा टीबी को लेकर गहन अनुसंधान और नवाचार को शामिल किए जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। हालांकि हिंदुस्थान अब बड़ी तेजी से टीबी उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जहां दुनिया ने २०३० तक टीबी उन्मूलन करने का लक्ष्य रखा है, वहीं हिंदुस्थान का संकल्प २०२५ तक टीबी मुक्त होना है।
कुछ दशक पूर्व टीबी को एक लाइलाज बीमारी माना जाता था लेकिन अब सही समय पर इसका समुचित इलाज कराए जाने से इसका पूरी तरह निदान संभव है और इलाज शुरू करने के बाद उसमें लापरवाही मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ के अनुसार टीबी अभी भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक जानलेवा बीमारियों में से एक है और दुनियाभर में प्रतिदिन करीब ४ हजार लोग इससे जान गंवाते हैं। प्रतिदिन करीब ३० हजार लोग इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। हालांकि आज टीबी का इलाज उपलब्ध होने पर ऐसे लोगों का सफल इलाज संभव है लेकिन जागरूकता के अभाव में हर साल लाखों लोग अब भी टीबी होने पर मौत के मुंह में समा जाते हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीबी से निपटने के वैश्विक प्रयासों के कारण ही वर्ष २००० से अब तक ६५ मिलियन से भी ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सकी है।
टीबी को लेकर इस भ्रांति को दूर करना भी जरूरी है कि यह कोई आनुवंशिक बीमारी नहीं है और यह समाज में किसी भी आयु समूह तथा सामाजिक-आर्थिक वर्ग के लोगों को हो सकती है। यदि मरीज में टीबी के लक्षणों की पहचान सही समय पर हो जाती है तो पूरा इलाज कराकर जल्द ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है। ऐसे मरीज डॉट्स सेंटर या सरकारी अस्पतालों में अपना नि:शुल्क इलाज करा सकते हैं। पूरी तरह से ठीक होने के लिए टीबी का पूरा कोर्स करना चाहिए अन्यथा यह बीमारी दोबारा हो सकती है। मरीज की स्थिति के अनुसार टीबी का पूरा कोर्स ९ से १८ माह की अवधि तक का हो सकता है और चिकित्सक के परामर्श के अनुसार रोगी के लिए कोर्स पूरा करना अनिवार्य होता है, क्योंकि ऐसा नहीं किए जाने पर उसमें मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर टीबी) होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है, जो ऐसे मरीज के लिए बहुत घातक साबित हो सकती है। बहरहाल, आज टीबी से घबराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश में इसका पक्का इलाज मौजूद है। ‘डॉट्स’ से हाथ मिलाकर टीबी जैसी जानलेवा बीमारी को हराया जा सकता है, बशर्ते डॉक्टर के निर्देशानुसार इलाज में कोई लापरवाही न बरती जाए।

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