मुख्यपृष्ठस्तंभआरक्षण और बेरोजगारी का दंश!

आरक्षण और बेरोजगारी का दंश!

डॉ. सी. पी. राय
मुंबई
आर्थिक रूप से कमजोर बड़ी जाति के आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का दो के मुकाबले तीन के बहुमत से आया नया पैâसला संवैधानिक, न्यायिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से नए विवादों को जन्म देनेवाला साबित हो सकता है क्या? इन सवालों के जवाब मिलने में शायद ज्यादा देर नहीं लगेगी। राजनीति ने तो अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी है पर वो कितनी दूर तक जाएगी, इसके लिए सुविधा, सत्ता और वोट बैंक की राजनीति के युग में अभी इंतजार करना होगा।
फिर भी न्यायिक सवाल तो खड़ा हुआ ही है कि जब पूर्ण पीठ ने पैâसला किया था कि आरक्षण ५०ज्ञ् से ज्यादा नहीं हो सकता तो पूर्ण पीठ के मुकाबले ५ जज की पीठ और उस पर ३/२ का पैâसला क्या पूर्ण पीठ के पैâसले का अतिक्रमण है और क्या आरक्षण में ये नया विवाद छेड़कर उसे राजनीति के अखाड़े में लाने का प्रयास किया जा रहा है?
संविधान सभा ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाई थी। जो प्रारंभिक तौर पर केवल एससी, एसटी के लिए थी और इस पर डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर की सोच थी कि ये १० वर्ष के लिए लागू हो, पर वो दस-१० वर्ष करके आगे बढ़ती रही और फिर मंडल आयोग द्वारा पिछड़ी जातियों का आरक्षण लागू हुआ, जिसने पिछड़े वर्गों को सशक्त भी किया। ये नहीं कह सकते कि आरक्षण ने गरीबी की खाई को पाटा, ये भी नहीं कह सकते कि इसने बेरोजगारी की समस्या को खत्म किया लेकिन इन वर्गों में आगे बढ़ने की उत्कंठा तो जगा ही दिया। इसके परिणामस्वरूप आज इन वर्गों के बच्चे गैर आरक्षित पदों पर भी अपना स्थान बनाने लगे हैं। हां, एक बात जरूर है कि जहां आजादी के बाद मिले आरक्षण पर समाज में कोई खास हलचल नहीं हुई थी, वहीं विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा पिछड़े वर्ग को आरक्षण लागू करने पर समाज के कुछ वर्गों में प्रतिरोध और खिन्नता देखी गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने जब पूर्ण पीठ में पैâसला किया था कि आरक्षण ५० ज्ञ् से ज्यादा नहीं होगा, तब सोच ये थी कि ५० फीसदी सीट योग्यता की प्रतियोगिता के लिए हो और ५०ज्ञ् सामाजिक रूप से पिछड़े लोगो के सशक्तीकरण के लिए हो। यद्यपि इस पर पिछड़ों का लगातार एतराज रहा और वो जातिगत जनगणना तथा संख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग करते रहे और इस पर तमिलनाडु ने पैर पैâलाया पर परिणामस्वरूप प्रतिभा का पलायन झेलना पड़ा। सबके अपने तर्क हैं, परंतु सवाल ये है कि एक तरफ प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू नहीं है और लागू करना मुश्किल भी है, तो वहीं दूसरी तरफ लगातार प्राइवेटाजेशन से तथा पदों के सीमित होते जाने से सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं। ऐसे में आरक्षण ऊंट के मुंह में जीरे से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो रहा है। जहां हर साल डेड़ करोड़ से ज्यादा नए लोग रोजगार चाहने वाले होते हैं, वहीं मुश्किल से २० से ३० लाख पदों का ही सृजन हो पाता है। ऐसे में बचे हुए लोग क्या करें? ये बड़ा सवाल है। सवाल ये भी है कि ७० वर्षोंे में आरक्षण अपने उद्देश्य में कितना सफल साबित हुआ है? क्या वाल्मीकि और अति दलित के घर में सामजिक न्याय की रोशनी की कुछ किरणें आज भी पहुंच सकी हैं? क्या आरक्षण से मजबूत पिछड़ी जातियों को छोड़ दें तो अति पिछड़ी जातियों के साथ न्याय हो पाया है और फिर वो सवाल भी सामने सीना ताने खड़ा हुआ है कि तथाकथित अगड़ी जातियों में जिनके पास कोई आय का साधन नहीं है, ये वो लोग हैं, जो भीख मांगने अथवा फुटपाथ पर सोने को मजबूर ैंâ तो क्या उन्हें सत्ता द्वारा प्रदत्त किसी सुविधा या न्याय से सिर्फ इसलिए वंचित किया जा सकता है कि वो किसी खास सरनेम के साथ पैदा हुए हैं? सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ को और देश की राजनीतिक व्यवस्था को आगे इन सवालों का जवाब खोजना होगा और राजनीतिक व्यवस्था तथा नीति-निर्माताओं को जवाब तो इसका भी खोजना होगा कि देश की ८० करोड़ की आबादी अगर कुछ मुट्ठी कृपा के अनाज पर आश्रित हैं तो क्यों? आखिर आज इतने वर्षों में भी रोजगार को अधिकार और स्वरोजगार को अभियान क्यों नहीं बनाया जा सका? आरक्षण राजनीति की रोटी तो सिकवा सकता है पर क्या समस्या को, बेरोजगारी, भुखमरी और बेबसी का इलाज भी कर सकता है और जब तक देश की राजनीति और नीति-निर्धारकों का चिंतन इसके इर्द-गिर्द नहीं होगा तब तक बाकी चीजों को सिर्फ समाज बताएगा, नौजवान कुंठित होगा और देश तथा समाज बेरोजगारी, भुखमरी के बोझ से बस कराहता रहेगा और वो किसी भयावह मुकाम पर देश को पहुंचाएगा, उसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।
(लेखक स्वतंत्र राजनीतिक समीक्षक हैं।)

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