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जीतकर भी हार गई भाजपा! … पांच राज्यों में कांग्रेस को साढ़े नौ लाख वोट ज्यादा मिले

• भाजपा के लिए २०२४ की राह नहीं है आसान
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजे आए हैं। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की है। इसके बाद भाजपा ने ऐसा माहौल बनाया है मानो कांग्रेस का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। पर अगर आप चुनाव में मिले मतों पर नजर डालेंगे तो मामला उलट नजर आता है। पूर्वी राज्य मिजोरम को छोड़ दें क्योंकि वहां काफी कम मत हैं। बाकी के चार राज्यों में अगर कुल वोटों का आकलन करें तो पता चलता है कि यहां जीतकर भी भाजपा हार गई है।
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दर्ज आंकड़ों को देखिए। इसके बाद पांचों राज्यों में सभी पार्टियों को मिले कुल मतों को जोड़ दीजिए। विजय का शंखनाद करने वाली भाजपा को कुल वोट मिले हैं ४,८१,३३,४६३ जबकि चुनाव में ‘परास्त’ हुई कांग्रेस को मिले हैं ४,९०,७७९०७ वोट। यानी भाजपा की तुलना में कांग्रेस को कुल मिलाकर लगभग साढ़े नौ लाख वोट ज्यादा मिले हैं।
फिर भी माहौल ऐसा बनाया जा रहा है मानो भाजपा ने कांग्रेस को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। तीनों हिंदी राज्यों में अगर सीटों की संख्या देखें, तो भाजपा ही भाजपा नजर आती है, लेकिन मतों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। राजस्थान में भाजपा को ४१.७ फीसदी वोट मिले हैं तो कांग्रेस को ३९.६ फीसदी वोट, यानी अंतर सिर्फ दो प्रतिशत का है। उधर छत्तीसगढ़ में फासला ४ प्रतिशत का है। भाजपा को ४६.३ प्रतिशत वोट मिले हैं तो कांग्रेस को ४२.२ फीसदी वोट। सिर्फ मध्य प्रदेश में फासला ८ फीसदी से भी ज्यादा है। तीनों राज्यों में हारने के बावजूद कांग्रेस के पास ४० प्रतिशत या अधिक वोट है, जहां से वापसी करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। तीनों हिंदी भाषी प्रदेशों में कुल मिलाकर भाजपा को जो बढ़त मिली है उसकी भरपाई सिर्फ एक तेलंगाना से हो जाती है। तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी को ३९.४ प्रतिशत (९२ लाख से ज्यादा) वोट मिले, जबकि भाजपा को १३.९ प्रतिशत (३२ लाख से भी कम)। जिस राज्य में २०१८ के बाद कांग्रेस चुनावी दौड़ से बाहर होने की कगार पर थी, वहां उसका शीर्ष पर पहुंचना राजनीतिक उभार और जिजीविषा का संकेत है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के कुछ ही महीनों में लोकसभा का चुनाव पिछले दो दशक से चला आ रहा है। पिछली बार २०१८ में भाजपा इन तीनों राज्यों में हार गई थी। लेकिन तब प्रधानमंत्री या मीडिया ने २०१९ के लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार निश्चित होने का दावा नहीं किया। इससे पहले साल २००३ में जब कांग्रेस इन तीनों राज्यों में हारी थी, उसके कुछ ही महीने बाद २००४ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने आशातीत सफलता प्राप्त की थी। मतलब यह है कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव की तासीर अलग होती है और सीधे विधानसभा से लोकसभा के बारे में निष्कर्ष निकालना गलत होगा।

उम्मीदवार का भी वोट निगल गई ईवीएम?
-बसपा प्रत्याशी ने गड़बड़ी का लगाया आरोप
रमेश ठाकुर / नई दिल्ली
ईवीएम की विश्वसनीयता फिर सवालों के घेरे में है। बसपा प्रत्याशी को एक भी वोट नहीं मिला, जबकि उन्होंने और उनके घर के छह सदस्यों ने वोट डाला था। ये घटना छत्तीसगढ़ के कुरूद विधानसभा के एक बूथ की है, जहां बसपा प्रत्याशी लालचंद पटेल ने ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगया है। पटेल का आरोप है उनके बूथ से उन्हें एक भी वोट नहीं मिला। उन्होंने सीधे तौर पर ईवीएम से छेड़छाड़ और वोट चोरी का आरोप लगाकर खलबली मचा दी है। उनके आरोप पर बड़े अधिकारी चुप हैं, नेता भी बोलने से बच रहे हैं। पटेल दिल्ली पहुंचकर मुख्य चुनाव आयोग से शिकायत करना चाहते हैं। बता दें, बसपा प्रत्याशी लालचंद पटेल जहां से वोटर हैं, उसी पोलिंग बूथ पर उन्होंने पत्नी और बाकी पांच सदस्यों के अलावा समर्थकों के साथ वोट डाला था। वहां उनके पटेल समुदाय के लोगों की संख्या भी अच्छी है, उन्होंने भी वोट दिया था। लेकिन जब काउंटिंग हुई तो वोट के नाम पर उन्हें शून्य मिला। पटेल ने कहा, चलिए मान लेते हैं उन्हें किसी ने वोट नहीं दिया, कम से कम खुद का डाला हुआ वोट तो मिलता।

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