मुख्यपृष्ठस्तंभभाजपा अब केरल, आंध्र और तमिलनाडु में सेंध लगाने जा रही

भाजपा अब केरल, आंध्र और तमिलनाडु में सेंध लगाने जा रही

सुषमा गजापुरे

भाजपा के लिए केरल, आंध्र और तमिलनाडु ऐसी चुनावी पहेली हैं, जिन्हें वो कभी हल नहीं कर पाई। शायद यही उसके दुख का एक कारण है कि उत्तर भारत में धर्म के आधार पर एकछत्र राज्य करने के बाद भी वो इन तीन राज्यों में अपनी पैठ नहीं बना पाई। दक्षिण भारत में कर्नाटक में भाजपा अच्छी पैठ बना पाई तथा इसके अलावा तेलंगाना में भी अपनी जड़ें मजबूत करने में उसे आंशिक सफलता मिली पर केरल, आंध्र और तमिलनाडु भाजपा के सर्वश्रेष्ठ काल में भी उससे दूरी बनाकर ही रहे। अगर २०१९ के चुनावों के परिणामों को देखें तो पाएंगे कि केरल की २०, आंध्र की २५ और तमिलनाडु की ३९ लोकसभा सीटों में उसे एक भी सीट प्राप्त नहीं हो पाई थी। २०२४ के चुनावों के लिए भाजपा कुछ बेहतर स्थिति में नजर आ रही है और उसे उम्मीद है कि वो इस बार इन राज्यों में थोड़ी बहुत सफलता हासिल कर पाएगी। आइए इन तीनों राज्यों की स्थिति को भाजपा के संदर्भ में विस्तार से देखें।
तमिलनाडु: तमिलनाडु को हम ४ भूभाग या मंडलों में विभाजित कर सकते हैं। इनमें उत्तर भाग में चेन्नई और वेल्लोर प्रमुख हैं। पश्चिम तमिलनाडु में कोयंबटूर, तिरुपुर, सेलम, धर्मपुरी और डिंडीगुल प्रमुख शहर हैं। मध्य तमिलनाडु में त्रिचिरापल्ली और कांचीपुरम प्रमुख शहर हैं, जबकि दक्षिण में मदुरै, रामनाथपुरम, कन्याकुमारी, शिवगंगा और तिरुनवेली मुख्य शहर हैं। भाजपा को २०१९ के लोकसभा चुनावों में ३.६६ प्रतिशत मत मिले थे तथा उसने अन्ना द्रमुक के साथ समझौता करके ३९ में से ५ सीटों पर चुनाव लड़ा था। सभी ५ सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। कन्याकुमारी और रामनाथपुरम में उसकी स्थिति फिर भी संतोषजनक थी पर कोयंबटूर, शिवगंगा और थूठूक्कुड़ी में उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। २०२३ में भाजपा अध्यक्ष अन्नामलाई ने एक नीति पर चलते हुए अन्ना द्रमुक के नेताओं पर बड़ा प्रहार किया और इस कारण से रूष्ट होकर अन्ना द्रमुक ने भाजपा से रिश्ता तोड़ लिया। भाजपा शायद यही चाहती थी, क्योंकि वह अब अन्ना द्रमुक के कंधों पर रहकर प्रदेश में प्रसार नहीं कर सकती थी। हो सकता है ये चाल भाजपा को उलटी भी पड़े पर उसने २०२४ के चुनावों के लिए एक बड़ा रिस्क लिया और वह सभी ३९ सीट पर स्वयं चुनाव लड़ने जा रही है। इस चुनाव में भाजपा १ से ३ सीट पर सिर्फ अपने ही बल पर चुनाव जीतने का प्रयास कर रही है तथा कोयंबटूर, कन्याकुमारी और रामनाथपुरम में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। एक आसार ये भी है कि नरेंद्र मोदी इस बार इन सीट में से ही किसी एक सीट पर चुनाव लड़ें और अपने पूरे दल को प्रोत्साहित करें। ये स्थिति बहुत दिलचस्प होती नजर आ रही है। एक बात यहां माननी होगी कि दक्षिण तमिलनाडु और कोयंबटूर मंडल में भाजपा अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।
केरल: केरल की २० सीटें भी हमेशा की तरह भाजपा के लिए एक बड़ी पहेली रही हैं। तमिलनाडु और आंध्रा में अन्य दलों के साथ गठबंधन करके कभी-कभार एक-आध सीट जीतती रही है पर केरल में उसे कभी ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ कि वो कभी केरल विधानसभा अथवा लोकसभा में कभी अपना खाता भी खोल सके। केरल में सबसे अधिक सीटें मध्य केरल में हैं। केरल में हिंदू आबादी लगभग ५३ प्रतिशत है, मुस्लिम २७ तथा ईसाई लगभग १९ प्रतिशत हैं। वही समीकरण भाजपा के लिए कष्टकारी है। यहां मुस्लिम और अधिकतर ईसाई भाजपा को वोट नहीं देते हैं। हिंदू आबादी में अधिकतर भाजपा को पसंद नहीं करते हैं। केरल में भाजपा को कभी १३ प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले हैं। इस बार भाजपा प्रयास कर रही है कि उसे १-२ सीट पर सफलता मिल जाए। जो सीट भाजपा गंभीरता से लड़ रही है, उनमें त्रिवेंद्रम, त्रिचूर, अट्टिंगल और पथनमथिटा हैं। भाजपा को पूरी उम्मीद है कि वो इस बार मोदी मैजिक के बल पर अपना खाता खोल सके। शायद सबसे अच्छा मौका भाजपा के लिए इस बार त्रिवेंद्रम सीट ही होगी।
आंध्रप्रदेश: इस राज्य की २५ सीटें एक प्रकार से भाजपा के लिए बहुत टेढ़ी खीर हैं। जगन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस तो भाजपा के साथ किसी समझौते के पक्ष में है ही नहीं पर भाजपा चंद्रबाबू नायडू की तेलगु देसम के साथ समझौते को काफी उत्सुक है। इस बार आंध्र में चंद्रबाबू के प्रति सहानभूति लहर भी है और जगन रेड्डी की बहन शर्मिला कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं। चंद्रबाबू की कई बार भाजपा की लीडरशिप से बात भी हो चुकी है पर अभी तक कोई फाइनल समझौता नहीं हुआ है। भाजपा शायद चंद्रबाबू से २५ में से ५ सीट मांग रही है, जो चंद्रबाबू देने को तैयार नहीं हैं। भाजपा की स्वयं की स्थिति इस प्रदेश में दयनीय है। पिछली बार के चुनाव में भाजपा को सिर्फ ०.९८ प्रतिशत वोट ही मिले थे। आंध्र में भाजपा का कोई आधार भी नहीं है और न कोई लीडरशिप है। इसलिए भाजपा चंद्रबाबू से गठबंधन को उतावली है। गठबंधन अगर हो जाता है तो शायद भाजपा का यहां पर खाता खुल सके। चंद्रबाबू का आधार आंध्र में श्रीकाकुलम, गुंटूर, विजयवाड़ा, कृष्णा और गोदावरी जिला है। इसके अलावा वो चित्तूर, कुर्नूल, अनंतपुर, नेल्लोर और प्रकासम मंडलों में भी काफी मज्ाबूत हैं। भाजपा इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहती है। कितनी सफलता उसे मिलेगी, ये अब समय ही बताएगा। भाजपा इस बार इन तीन राज्यों में खाता खोलकर कर्नाटक और तेलंगाना में होनेवाले नुकसान को कम करना चाहती है। पर एक बात तो पक्की है कि इस बार भाजपा दक्षिण के इन तीन राज्यों में बड़ी तैयारी के साथ उतर रही है और किसी भी स्थानीय दल को हल्के में नहीं लेना चाहिए। २०२४ के चुनाव इन राज्यों में काफी दिलचस्प परिणाम लेकर आएंगे, इसमें कोई शक नहीं है।
(लेखिका प्रसिद्ध चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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