मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाउत्तरनामा: नए मंत्रिमंडल का गठन...२०२४ का भाजपाई पांसा!

उत्तरनामा: नए मंत्रिमंडल का गठन…२०२४ का भाजपाई पांसा!

• हेमंत तिवारी ।  उत्तर प्रदेश में चुनावी नतीजे आने के १५ दिनों के बाद भी नई सरकार के गठन न हो पाने के पीछे किसी तरह की मजबूरी न होकर आगामी लोकसभा चुनावों के समीकरण हैं, जिन पर भलीभांति मंथन के बाद ही भाजपा आगे बढ़ना चाहती है। पर्याप्त बहुमत पाने और सब कुछ मन मुताबिक होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में यूपी सरकार के गठन को लेकर बैठकों का दौर जारी है। मुख्यमंत्री का नाम भी तय है और मंत्रिमंडल में शामिल होनेवाले अधिकांश नाम पर भी आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। पार्टी बीते साल सरकार और संगठन के तालमेल को लेकर उठे सवालों और बैठकों के दौर के दोहराव से भी बचना चाहती है। इन्हीं सबको देखते हुए यूपी में सरकार के गठन का इंतजार सामान्य से कुछ ज्यादा ही लंबा खिंच गया है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा ने यूपी विधानसभा का चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे को सामने रख कर लड़ा। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने योगी के नाम पर ही जनता से वोट मांगे। जनता के बीच भी बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही पहली पसंद बन कर उभरे हैं, जिन्हें जनसमर्थन भी मिला है। खुद योगी आदित्यनाथ अपने गृह क्षेत्र गोरखपुर से विधानसभा का चुनाव लड़े और भारी मतों से जीते भी। नतीजे आने के साथ ही यह तय हो गया था कि अगले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ योगी आदित्यनाथ को ही दिलायी जाएगी और वही अब अगले पांच साल तक सरकार के मुखिया होंगे। भारी-भरकम जीत से योगी का कद न केवल यूपी में बल्कि देशभर में बढ़ा है और भाजपा के लिए वो मोदी के बाद दूसरे सबसे बड़े आकर्षण के तौर पर उभरे हैं।
भाजपा यूपी के मंत्रिमंडल के गठन के जरिए जनता में यह संदेश देना चाहती है कि उसके यहां योग्यता की कद्र है और असरदार लोगों को ही मंत्री बनाया जाता है। माना जा रहा है कि योगी के नए मंत्रिमंडल में बड़ी तादाद में विषय विशेषज्ञ, पूर्व काबिल नौकरशाह और तपे तपाए राजनेताओं का सामंजस्य होगा। इस बार भाजपा के टिकट पर पूर्व नौकरशाह राजेश्वर सिंह और असीम अरुण चुनाव जीत कर आए हैं तो पीएमओ में काम कर चुके अरविंद शर्मा पहले से मौजूद हैं। योगी के नए मंत्रिमंडल में इनको जगह मिल सकती है। भाजपा की कोशिश पिछड़ों और दलितों को भी उचित प्रतिनिधित्व देने की है, जिनका बड़ी तादाद में वोट इसे विपरीत परिस्थितियों में भी मिला है। महिलाओं को वोटों की जीत में बड़ी भूमिका होने के चलते उन्हें भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने में जहां कोई संदेह नहीं है, वहीं सरकार में उप मुख्यमंत्रियों को लेकर जरूर भाजपा के भीतर ऊहापोह की स्थिति है। भाजपा नेतृत्व का एक हिस्सा जहां किसी को भी उप मुख्यमंत्री न बनाए जाने की हिमायत कर रहा है, वहीं बड़े हिस्से का मानना है कि जातीय संतुलन बिठाने के लिए कम से कम तीन उप मुख्यमंत्री बनाए जाने चाहिए। गौरतलब है कि राज्यों में उप मुख्यमंत्री के पद की कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है बल्कि उसके अधिकार किसी वैâबिनेट मंत्री के बराबर ही होते हैं। फिलहाल यूपी में उप मुख्यमंत्री के लिए जिन नामों को लेकर सुगबुगाहट हो रही है, उनमें पुराने नामों में केशव प्रसाद मौर्य शामिल हैं तो ब्राह्मणों के प्रतिनिधि के तौर पर ब्रजेश पाठक और दलित व महिला कोटे से बेबीरानी मौर्य का नाम सबसे ऊपर है। हालांकि एक कवायद पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा को लेकर भी चल रही है। इतना तय है कि पहले की सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे दिनेश शर्मा को संगठन में भेजा जा सकता है।
योगी की पिछली सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा का चुनाव सिराथू से हार गए हैं तो दूसरे दिनेश शर्मा ने चुनाव ही नहीं लड़ा। भाजपा में पिछड़ों के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित केशव प्रसाद मौर्य का उचित समायोजन सबसे बड़ी गुत्थी है, जिसे सुलझाने में लंबा वक्त लगा और बैठकों के कई दौर चले। स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी के पार्टी छोड़ने के बाद केशव प्रसाद मौर्य का महत्व और भी बढ़ जाता है और उन्हें योगी वैâबिनेट में स्थान देना भाजपा की मजबूरी भी है। हालांकि पहले यह खबर भी चली थी कि केशव प्रसाद मौर्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान देकर उन्हें संतुष्ट किया जा सकता है या फिर संगठन की कमान उनको दी जा सकती है। माना जा रहा है कि केशव ने अपनी रुचि इनमें से किसी काम में नहीं दिखायी है और वो सरकार में ही रहेंगे।
इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी रहे दलों में अपना दल (एस) के १२ तो निषाद पार्टी के ११ विधायक जीत कर आए हैं। अब इन दोनों दलों की मांग कम से कम दो मंत्री पद की और बड़े विभागों की है। भाजपा नेतृत्व की पूरी कोशिश इन दलों को एक-एक मंत्री पद देकर संतुष्ट करने की रही है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद कम से कम अपने लिए एक वैâबिनेट तो एक राज्य मंत्री की मांग कर रहे हैं। अपना दल की मुखिया अनुप्रिया पटेल के पति आशीष पटेल भी इतने की ही मांग कर रहे हैं। माना जा रहा है कि संख्याबल को देखते हुए सहयोगियों के लिए दो वैâबिनेट व दो राज्य मंत्री का पद छोड़ा जा सकता है।
सतीश महाना, जय प्रताप सिंह, आशुतोष टंडन, सूर्यप्रताप शाही, रमापति शास्त्री, जितिन प्रसाद, रवींद्र जायसवाल, गिरीश यादव, सुरेश पासी और नितिन अग्रवाल जैसे पुराने नाम तो हर हाल में मंत्रिमंडल में बरकरार रहेंगे। योगी मंत्रिमंडल के पूर्व में मंत्री रहे और सबसे वरिष्ठ विधायकों में से एक सुरेश खन्ना को इस बार विधानसभा अध्यक्ष बनाया जा सकता है। योगी मंत्रिमंडल के पुराने चेहरों में ११ लोग चुनाव हार गए हैं, जबकि चार दर्जन ने जीत दर्ज की है। माना जा रहा है कि कम से कम आधे पुराने मंत्रियों को दोबारा स्थान मिल सकता है और आधे नए व युवा चेहरे जगह पा सकते हैं। नए और युवा चेहरों में शलभमणि त्रिपाठी, पंकज सिंह, राजेश त्रिपाठी, केतकी सिंह और दयाशंकर सिंह का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है।
कुल मिलाकर योगी सरकार नए स्वरूप के जरिए न केवल जनता के बीच उसके असरदार होने का संदेश देने बल्कि सामाजिक समरसता के भाजपा के अभियान को और तेजी के साथ आगामी लोकसभा चुनाव में ले जाने का प्रयास करती नजर आ रही है। मंत्रिपरिषद में शामिल होने वाले नामों से यह संकेत मिल रहा है कि भाजपा यूपी में लोकसभा चुनावों में किस रणनीति के साथ उतरने वाली है। हालिया चुनावी नतीजों ने साफ कर दिया है कि भाजपा की अगली जीत की बुनियाद में भी अगड़ों के साथ पिछड़ों और इस बार बड़ी तादाद में दलितों को साधने का प्रयास किया जा रहा है।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)

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