कोरा कागज

ताउम्र मैं किताब -ए- हयात की जिल्द संभालता रहा
पन्ने अंदर के बिखरने को थे बेताब पता ही नहीं चला
संजोए थे हिफाजत से पन्ने जिंदगी की किताब के मैंने
जज्बात से मेरी वे वाकिफ हो गए पता ही नहीं चला
बिताया किए थे खुशी के लम्हे कभी अपनों के साथ
कब छोड़ दिया साथ हर अपने ने पता ही नहीं चला
पढ़ा ही नहीं किसी ने हर्फों को शिद्दत से बयां लम्हों के
अश्कों की नमी में हर्फ कब घुल गए पता ही नहीं चला
मायने बहुत थे लिखे हर हर्फ के जिंदगी में ‘ सुधीर ‘
ज़िंदगी कब कोरा कागज होती गई पता ही नहीं चला…
–सुधीर केवलिया
जय नारायण व्यास नगर,
बीकानेर, राजस्थान

 

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