मुख्यपृष्ठस्तंभमणिपुर से मेवात तक नाकाम सरकारों की रक्तरंजित सियासत!

मणिपुर से मेवात तक नाकाम सरकारों की रक्तरंजित सियासत!

जीतेंद्र मल्लाह मुंबई

पूरे देश में किसी भी हाल में एकछत्र राज करने की भाजपा और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की मंशा आज किसी से छिपी नहीं है। इसके लिए चुनाव जीतने के लिए भाजपा कोई भी हथकंडा अपनाने को तत्पर नजर आ रही है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गोवा और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में जनता द्वारा ठुकराई गई भाजपा ने केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके सत्ता हथियाने का शर्मनाक कृत्य किया था। ये जनता देख चुकी है। चुनावी वादों को जुमला बताकर वादाखिलाफी करने वाली मोदी सरकार बीते ९ वर्षों में देश को नाकाम नोटबंदी, खून चूसनेवाली जीएसटी, बेतहाशा महंगाई, बेरोजगारी और मजहबी दंगों के अलावा कुछ भी नहीं दिया है। इससे आजिज आकर कर्नाटक की जनता ने भाजपा को उसकी घाती सियासत का जो हश्र दिखाया है, उससे शून्य उपलब्धियोंवाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा हिल गई है। वर्ष २०२४ में होनेवाले लोकसभा चुनाव किसी भी कीमत पर जीतने के लिए मोदी सरकार लगातार नफरती हिंसा का सहारा ले रही है, ऐसा आरोप अब विपक्ष और हिंसा पीड़ित लोग खुलकर लगा रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों में जिस तरह से जातीय एवं मजहबी हिंसा भड़क रही है, उससे तो ये तमाम आरोप सही ही लगने लगे हैं।
देश के पूर्वोत्तर में स्थित सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य मणिपुर बीते करीब तीन महीनों से हिंसा की आग में जल रहा है। जैसा कि आमतौर पर दंगों में होता है, उसी तरह मणिपुर में कई लोगों को कत्ल कर दिया गया, बड़े स्तर पर तोड़फोड़-आगजनी की घटनाएं हुई, लेकिन शर्मनाक ये है कि वहां महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई और उनकी नग्न परेड निकाली गई, जबकि सरकार और पुलिस प्रशासन चुप्पी साधे बैठा रहा। सुप्रीम र्कोट की फटकार के बाद वहां सरकार जागने का दिखावा भले ही कर रही है लेकिन हिंसा अभी भी थमी नहीं है। भाजपाई सरकार और उसके मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की गलत नीतियों के कारण मणिपुर के टूटने का खतरा बढ़ता रहा है। वहां जारी हिंसा पर पुलिस की रहस्यमयी निष्क्रियता को लोग राज्य सरकार की साजिश करार देने लगे हैं। माना जा रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार का इसे मौन समर्थन प्राप्त है। मणिपुर हिंसा में पुलिस की भूमिका की सुप्रीम कोर्ट तक आलोचना कर चुका है। सर्वोच्च न्यायालय तो केंद्र व राज्य सरकार के अस्तित्व तक पर सवाल खड़े कर चुका है। मणिपुर की िंहसा की आग में जलने के दौरान भाजपा शासित एक और राज्य में हिंसा की आग भड़क उठी है और हैरानी की बात ये हैं कि वहां की सरकार व पुलिस भी मणिपुर की सरकार व पुलिस की ही तर्ज पर निष्क्रिय बनी हुई है। हम बात कर रहे हैं भाजपाई सीएम मनोहर लाल खट्टर के सूबे हरियाणा की।
मणिपुर की तरह उन्मादी हिंसा की आग दिल्ली से हरियाणा तक पैâल चुकी है और इसे निरंतर आगे पैâलाने की कोशिशें जारी हैं। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय ने हिंसा की आग में जल रहे एक और ‘भाजपाई’ राज्य हरियाणा की पुलिस और सरकार पर भी सवाल उठाया है, जबकि हरियाणा के सीएम मनोहरलाल खट्टर कह रहे हैं कि सरकार हर किसी को सुरक्षा नहीं दे सकती। वो दंगाइयों से नुकसान की भरपाई करवाने का दावा करते हुए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील तो कर रहे थे, लेकिन साथ ही ये भी कह रहे हैं कि कोई शांति की गारंटी नहीं दे सकता, न पुलिस, न आर्मी। याद दिला दें कि हरियाणा के मेवात-नूंह इलाके में सोमवार को एक धार्मिक यात्रा निकलने के दौरान दो समुदायों के बीच हिंसा भड़क गई थी। हिंसा में दो होमगार्ड समेत ६ लोगों की मौत हो गई। नूंह हिंसा की आग अगले दिन गुरुग्राम सहित पूरे हरियाणा में पहुंचने लगी है। गुरुग्राम में भीड़ ने शहर के सेक्टर-५७ में २६ वर्षीय एक व्यक्ति की हत्या कर दी और एक धर्मस्थल पर आग लगा दी। सोहना में कई दुकानों व वाहनों को दंगाइयों ने फूंक दिया। पलवल-फरीदाबाद में सोमवार रात से ही धारा-१४४ लगाकर इंटरनेट और एसएमएस सेवाओं को बंद कर दिया गया था। मंगलवार को स्कूल-कॉलेज भी बंद रहे। चार रूटों पर हरियाणा रोडवेज की बस सेवा अस्थायी तौर पर बंद कर दी गई।
मणिपुर से दिल्ली व मेवात तक भड़की हिंसा के पीछे वजहें भले ही अलग-अलग नजर आ रही हैं लेकिन तमाम उपद्रवों को भड़काने के पीछे मंशा एक ही नजर आती है, चुनाव के दौरान वोटों का ध्रुवीकरण। इसमें भाजपा के सहयोगी सगंठन और बी, सी पार्टियों के लोग पूरी शिद्दत से पसीने के साथ-साथ खून बहाने को सक्रिय नजर आ रहे हैं। हरियाणा से पहले देश की राजधानी दिल्ली के नांगलोई में २९ जुलाई को मुहर्रम के जुलूस के दौरान झड़प और पत्थरबाजी हुई थी। उस हिंसा में कई लोग घायल हुए थे। ऐसे में नूंह में पैâली हिंसा की वजह से हरियाणा के साथ-साथ दिल्ली में तनाव पसर गया है। भाजपा समर्थित कथित हिंदूवादी संगठनों की रैलियों से सूबे में हिंसा के बढ़ने की आशंका को देखते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सूबे व आस-पास के क्षेत्रों में हिंदूवादी संगठनों द्वारा निकाली जा रही रैलियों को रोकने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर दो जजों की पीठ ने सुनवाई की। हालांकि, कल कोर्ट ने रैली और प्रदर्शन पर रोक तो नहीं लगाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फिर से सुनवाई करने की बात कहते हुए सरकार को निर्देश दिया कि हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करें। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेताते हुए कहा कि ये सुनिश्चित करें कि न हिंसा हो न हेट स्पीच। सुरक्षा के तुरंत उपाय किए जाएं। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त प्रीकॉशन लिए जाएं, साथ ही अतिरिक्त पुलिस बल तैनात हो और सीसीटीवी और वीडियोग्राफी हो। गौरतलब हो कि मणिपुर व हरियाणा में कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी वहां की राज्य सरकारों की है, जबकि दिल्ली में कानून व्यवस्था बनाए रखना भाजपा में पीएम नरेंद्र मोदी के बाद नंबर दो का कद रखनेवाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है। लेकिन दिल्ली में भी सांप्रदायिक दंगों की आग बार-बार भड़काई जा रही है। लेकिन इन तमाम जगहों पर हिंसा थमने का नाम ही नहीं ले रही है। वहां मानों कोई ‘महाशक्ति’ जानबूझकर हिंसा को भड़काने में लगी हुई है। ऐसे में सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर ही टिकी हुई हैं। बाकी तो कर्नाटक की तर्ज पर जनता बैलेट से जवाब देगी ही।

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