मुख्यपृष्ठस्तंभपुस्तक समीक्षा: मानव जीवन के समग्र आयामों का आईना `अवधी आखर'

पुस्तक समीक्षा: मानव जीवन के समग्र आयामों का आईना `अवधी आखर’

राजेश विक्रांत

कवि एड. राजीव मिश्रा की `अवधी आखर’ मानव जीवन के समग्र आयामों को स्पर्श करते हुए मन में लोक की हिलोरें उठाती हैं। ये पुस्तक पाठकों को उनकी मिट्टी की याद दिलाती है। भूमिका में `सैलानी’ ने लिखा है, `लोकगीतों में बैठकर लोक रीति-रिवाजों को कायम रखा गया है। पारंपरिक लोक गीत, लोक धुनें, लोक संस्कृति, लोक चित्रण एवं लोक भाषा का अद्भुत बिंब यथार्थ प्रतीत होता है। एक तरफ पुस्तक में जहां पारंपरिक लोकगीतों, ऋतुगीतों और संस्कार-गीतों का निर्वाह किया गया है, वहीं कवि की ग्रामीण परिवेश में करवट लेती सामाजिक और पारिवारिक विखंडन पर भी पैनी नजर है।’ खुद कवि के मुताबिक, `अवधी भाषा के समृद्ध साहित्य परंपरा की शृंखला में यह मेरे द्वारा एक छोटा सा प्रयास है, जिसके द्वारा मैंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मभूमि परम पावन अवध क्षेत्र के संस्कार-गीत, ऋतु-गीत, उत्सव-गीत, भजन और लोकगीतों की विधा को समृद्ध करने और सहेजने का उपक्रम किया है। `अवधी आखर’ एक कातर पुकार है उन प्रवासियों से, जो अपनी समृद्ध संस्कृति और संस्कार को आधुनिकता के चश्मे से देखते हुए गांव की माटी से पलायन कर जाते हैं।’
पुस्तक में प्रार्थना, देशभक्ति, लोकगीत, माटी के गीत, भजन, शृंगार गीत, ऋतु गीत, संस्कार गीत व वुंâडलियां खंड के तहत वीर शिवाजी, जब तक सूरज चंदा चमकी, गोरा बादल वीर महान, इहय भारत हमार, सिमवां पे जाए द सजनियां, रुका तनी भैया मोरे, सवनवां में आग लागै ननदी, हमरे गंउआ की ओर, तनी बतावा बाबूजी, सपना के संसार, गंउआ याद आई, गंउआ के प्यार, जमाना, हमरौ सुनि लेतअ अरजिया, बहुत याद आवे लड़कपन उ मोरा, पिया विधायक भइलें ना, लड़ा परधानी, बलम दिन वैâसे बिताई, हे रघुराई हो, दर्शनवा देई द मइया, पंथ निहारत है सगरो ब्रज, अवध में बाजे बधईया हो, आज बगिया में अइले राजा राम सखी, आओ पधारो राजा राम, रखिहा सेंहुरवा क लाज, लोकगीत, बोल कछु बोल, मुरलिया बैरन भई, भरन नीर जमुना पे जाई, आजा पिया सावन में, बंसुरिया परान लेइ लेई, पनिया भरन वैâसे जाई, हमके देखा संवरिया, झूला पड़ गयो, कजरी, झलुववा पे डर लांगी कान्हा, होरी खेलें बनवारी, फगुवा, रार जनि करा हो कन्हैया, होरी खेलैं नंदलाला, साजन महीनवां फागुन में, गिर गई नथुनियां होरी में, फगुनवां में ना जइबे ननदी, डूबल मोर नगरिया, भरल बा पानी रे हरी, होली गीत, शहर में बवाल होइगा ननदी, इमरती बेनीराम के, चच्चा भोरवै में, कहिया अईबा तू सजनवां, तोहरे अंगनवा के हई हम चिरइया, कइसे कईला बाबा मोर बियाह, जशोदा जाए ललना, डगरिया हाली हाली हो चला, कहवां पे बोलेलीं कोयलिया, सुना हो बबुआ, मड़वा के हिलाई मांगे, नाहीं जाबै बाबा, वुंâडलियां आदि अवधी रचनाएं हैं। कवि `प्रार्थना’ में कहता है- `जस पूजा मा सबसे पहिले, पूरा जग तोहका मानत हौ, गणपति सब विघ्न हरौ हमरौ, महाराज मनोरथ जानत हौ।’ …. `सिमवा पे बाटे सैंया मोर हो, सवनवां में आग लागै ननदी।’ उनकी एक वुंâडली देखें- `कतवारू के हो गइल, बेलगाम संतान। उहै भोरहहै जागि के, बांटई सबके ज्ञान। बाटइ सबके ज्ञान, पान मुंह मां पगुरावइ। इज्जति कौड़ी केर, मूंछ दोनउं गुरियावइ। मोबाइल मा डूब, रहय जेकर मेहरारू। ज्ञान ध्यान कइ बात, सुनावै उ कतवारू।।’
कुल मिलाकर `अवधी आखर’ एक बढ़िया उम्मीद जगाती है। इसे इरा पब्लिशर्स कानपुर ने प्रकाशित किया है। ८० पृष्ठों की पुस्तक के पेपरबैक संस्करण का मूल्य २०० रुपए है। इसे महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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