मुख्यपृष्ठस्तंभपुस्तक समीक्षा : गजलों की रंगबिरंगी `बोलती रोशनाई'

पुस्तक समीक्षा : गजलों की रंगबिरंगी `बोलती रोशनाई’

राजेश विक्रांत

डॉ़ फूलकली गुप्ता पूनम देश की सुविख्यात रचनाकार हैं। वे नारी सशक्तीकरण की प्रबल पक्षधर, हिंदी-संस्कृत की विद्वान व कुशल अभिनेत्री भी हैं। सोशल मीडिया व मंचों पर वे बेहद सक्रिय रहती हैं। उनके गजल संग्रह ‘बोलती रोशनाई’ में कुल १०१ गजलें हैं।
पुस्तक के `कुछ लफ्ज मेरे’ में डॉ़ पूनम ने लिखा है कि `जीवन के झंझावातों को झेलते हुए मुझे एक क्षण तो जिंदगी का मुखौटा लगाए हुए मौत दिखी, पर दूसरे ही क्षण पिताजी की स्नेहिल दृष्टि और मां का नेह सना आंचल जिंदगी की तपिश दूर करने हेतु काफी था। इन्हीं के मध्य में कब कलम से यारी हो गई, रोशनाई बोलने लगी, लफ्ज महकने लगे, पता ही नहीं चला। छायावादी लेखन से सफर का आगाज करके गीत, छंद, गीतिका, मुक्तक, छंदमुक्त सृजन से होते हुए कब अशआर ने अपने आगोश में लेकर सुध-बुध छीन ली, इसका तनिक भी हमें भान न हुआ।… गजल सुंदरी ने शीतल जल से हमें जैसे भिगोया हम ख्वाबों में खो करके कल्पनाओं के समंदर में डूब गए और जब बाहर निकले तो मोती के साथ।’
इसीलिए बोलती रोशनाई की गजलों में मोतियों के रूप में जीवन के सभी रंग दिखते हैं- दर्द, मां, पपीहा, सनम, धड़कन, देश, तिरंगा, प्यार, निगाहें, इबादत, वफा, खत, बचपन, राधा, रुक्मिणी, सावन, दिल्लगी, बेवफाई, जुल्फ, घटा, आंसू, बादल, दिल, आशियाना, पलकें, नजरें, खुशबू, जुदाई, फूल, पुरवाई, मीरा, जख्म, सियाही, समंदर, बरसात, सितारे, रोशनी, मिलन, अजनबी, दीदार, सितम, अमराई, मधुमास, तस्वीर, कली, घूंघट, चांद, उलझन, इनायत, दुपट्टा, पैगाम, अंजुमन आदि शब्दों व भावनाओं की जमीन पर लिखी गई डॉ. पूनम की गजलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अगर इसमें प्यार, मोहब्बत, इश्क, दर्द, मिलन, बिछोह है तो देशभक्ति की बात भी है। `मेरी धड़कन में बसता है हमारा देश भारत ये, मुझे दिलवर सा लगता है हमारा देश भारत ये। कटा दूं शीश मैं अपना चढ़ा दूं इसके कदमों पर, सदा दीपक सा जलता है, हमारा देश भारत ये।….तिरंगा ये फहरता है जहां सूरज ओ बसता है, हवा का रूख बदलता है जहां सूरज वो बसता है, मेरा महबूब `पूनम’ है हमारा देश ये भारत, फरिश्तों सा उतरता है जहां सूरज वो बसता है।…अबे सुन ले ओ पाकिस्तान अब तू होश में आ जा, नहीं बन जाएगा श्मसान अब तू होश में आ जा। जरा सा याद करना कारगिल में मुंह की खाई थी, कुचल डाला तेरा अभिमान अब तू होश में आ जा।’ डॉ. पूनम राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, अमेठी में प्रधानाचार्य हैं। इस कॉलेज को उन्होंने दिल से ऐसा सजाया और संवारा है कि हर छात्रा उनके नेतृत्व में अपना स्वर्णिम भविष्य देखती है। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व सिर्फ शिक्षा क्षेत्र का ही होकर नहीं रहा, बल्कि साहित्य, क्रीड़ा, स्काउट गाइड, नारी सशक्तीकरण, पर्यावरण, लैंगिक समानता, समाजसेवा एवं अन्य अनेकों सामाजिक गतिविधियों में भी अपनी आभा बिखेर रहा है। गीत और गजलों के क्षेत्र में भी उनका कोई सानी नहीं है लगभग ४००० गजलों और ५०० गीतों के द्वारा उन्होंने साहित्य को अनुपम ऊंचाई दी है। आईने में चांद, रेत का समंदर, बेचैन चांदनी, बेखबर वक्त की रचनाकार डॉ. पूनम की शब्द संपदा बेहद कोमल व संजीदा है जो कि सीधे पाठकों के दिलों में उतरती है। वे एक साथ प्यार की भावनाओं व देश भक्ति दोनों को लेकर चलती हैं- मिरी जाने गजल `पूनम’ तुझे मैं सजदा करती हूं, तिरे पहलू में आती हूँ तो दुनिया भूल जाती हूँ।… शहीदों की चिंताओं से कभी जब हम निकलते हैं, वो मंजर याद आता है तो कदम मेरे ठहरते हैं। गजल लिखती नहीं हूं मैं यही मेरी कहानी है। बहाना लफ्ज बनते हैं फसाना ये ज़ुबानी है। भले ही आंख का काजल तिरी तकदीर बन जाए, हमारी आंख में तो बस यही पानी ही पानी है। `बोलती रोशनाई’ की गजलें भी पाठकों को संवेदनशील अनुभवों का सुखद ठहराव देती हैं। गजल के शौकीनों को ये पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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