मुख्यपृष्ठस्तंभपुस्तक समीक्षा : रचनात्मक ‘निधि' की ‘स्वर्णिम आभा'

पुस्तक समीक्षा : रचनात्मक ‘निधि’ की ‘स्वर्णिम आभा’

राजेश विक्रांत

कवयित्री निधि माथुर बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी, एमए अंग्रेजी की टॉपर होने के साथ एक सफल शिक्षाविद एवं उद्यमी हैं। वे प्रतिनिधिज्ञ इंग्लिश अकादमी, मुंबई की सह-संस्थापिका हैं। नोशन प्रेस डॉट कॉम द्वारा प्रकाशित ‘स्वर्णिम आभा’ उनका काव्य संकलन है, जिसमें विभिन्न विषयों पर कवयित्री ने अपने हृदय के भाव प्रस्तुत किए हैं। इसमें प्रेम, मित्रता, प्रकृति, शिक्षा, पर्व, हास्य, मानव प्रकृति, विवाह, मौसम, बचपन, स्त्री, समसामयिक घटनाओं एवं हृदय के अंतर्द्वद्व को व्यक्त करती हुई कविताएं हैं। ‘सृष्टा’ खंड में मनमोहना, विपदा हर लो भगवान, ईश्वर का सृजन, मेरो सांवरो कन्हाई, राघव, ‘मर्मज्ञ’ खंड में गुरु की महिमा, नमामि गुरु चरणम, ‘निसर्ग’ में निर्झर, प्रकृति का श्रृंगार, जीवन का आधार वृक्ष, सृजन, आनंदोत्सव, सृष्टि, पुरवा, सूर्य वंदना, पूर्णिमा की विभावरी, उन्मुक्त पखेरू, तुम्हारा इंतजार है, ‘वनिता’ में नारी, स्त्री, स्त्री का मान, अन्याय का विरोध, निष्कलमष को न्याय, वनिता, जननी, तनया, अनुराग में अनुभूति यह है एक नवल, तुम्हारे लिए, सुखमय संसार के आधार, जीवन ऊर्जा स्रोत, अद्भुत बाल्यकाल, मेरे जीवनसाथी, भाए न मोहे सावन सखी री, पितृ छाया, परिवार एक वट वृक्ष, प्यारा बचपन, ‘वेदना’ में अंतत:, दंश, चक्रवात, मंथन शांत, संघर्ष से स्वाभिमान तक, सत्य के प्रवक्ता, ‘पर्व’ में दीपोत्सव, दीपावली का पर्व, दीपमालिका महोत्सव, होरी गीत, खेलूं सांवरे संग होरी, बिरज को रंगरसिया, स्नेह की डोर, उत्तरायण पर्व, ‘प्रेरणा’ में मां भारती, रचना का सृजन, प्रणमामि मां भारती, भारत का गौरव हिंदी, वंदेमातरम, एक गुफ्तगू, ‘मैत्री’ में मित्रता, बाल्यकाल की मैत्री, ‘बाल कविता’ में श्रीनगर की एक रात, वर्षा का उपहार, चलें हम पाठशाला, प्रदूषण के दुष्प्रभाव, फूल हमारे साथी, ‘ऋतुएं’ में खुशनुमा सर्दियां, गर्मियों का मौसम, बरखा ऋतु, मधुमास, आस भरा नया बरस, सुस्वागतम हे नववर्ष तथा ‘विवाह गीत’ में बधाई कुल ७१ कविताएं हैं। कवयित्री की भाषा प्रांजल व परिष्कृत है।
‘प्रकृति का शृंगार’ में वे लिखती हैं- रक्तिम आभा से दमकता पलाश, किसलय के स्पर्श से झूमता अमलतास, झरते हरसिंगार का मधुरिम सुवास, बसंती कनेर बिखेरता उल्लासा।
मधुमालती का खिलता रूप, रजनीगंधा की सुरभि अपूर्व, स्वर्णिम, छनती, सिहरती धूप, रूप गर्विता प्रकृति का स्वरूप।।
‘अन्याय का विरोध’ में उनकी लेखनी नए विचार देती है- यंत्रणाओं, उत्पीड़न से स्त्री को मुक्त कर, विपदाओं को उसकी हर कर, शिक्षा पथ पर करें अग्रसर, तभी सुनाई देंगे परिवर्तन के स्वर।।
‘होरी गीत’ में लोकरंग की खुशबू देखिए- गावो मधुर फाग कि आज है होरी, डार अबीर गुलाल धरती रंगो री, प्रेम रस से भीजो ए गोरी, सैंया फिर ला देंगे चुनर कोरी, चंद्रकला में भर दे मिठास तोरी, सखियों संग आज बनत बरजोरी, संगियों की सुनो न कोई चिरौरी, इंद्रधनुषी रंग समेट लो झोरी, पुलक अनूठी मन में भरो री, गावो मधुर फाग कि आज है होरी।।
‘स्वर्णिम आभा’ में ब्रज व अवधी की कविताएं हैं। निधि माथुर अनुभूतियों की रचनाकार हैं। उन्होंने अन्य मानवीय संवेदनाओं जैसे कि लोभ, घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा आदि का भी सुंदर चित्रण किया है। लगभग सभी रसों में उन्होनें अपनी कविताएं लिखी हैं। १३८ पृष्ठ की इस पुस्तक का कवर सुंदर है। आंतरिक रेखाचित्र भी आकर्षक हैं। पुस्तक का मूल्य २४९ रुपए है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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